Thursday, March 12, 2026

मीडिया आज और कल

कुछ दिनों पहले बड़े भैया से कॉल पर बात हो रही थी। उन्होंने बताया इन दिनों वे न्यूज डिबेट के रंगारंग कार्यक्रम का आनंद उठा रहे हैं। कहीं कोई मीडिया प्रभारी अपने दल के प्रतिनिधित्व करते वक्त मर्यादाएं लांघता है। तो कुछ भले मानुष सिर्फ डिबेट में आते ही दबने के लिए हैं। न्यूज एंकर्स भी विपक्षी दलों की दाल गलने नहीं देते। अगर कभी आंच तेज होने लगती देखते हैं तो तुरंत स्टोव बंद कर देते हैं। फिर वहीं शहर के प्रतिष्ठित प्रिंट मीडिया संस्था ने मीडिया की भूमिका पर आधारित एक कार्यक्रम आयोजित किया। जिसमें सम्मिलति होकर मीडिया संस्थानों की वर्तमान स्थिति समझने की कोशिश की परंतु सार्थक विमर्श प्राप्त नहीं हो सका। इसलिए किताबों का सहारा लेना उचित समझा।

भारत में हमेशा से ही मीडिया कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर पर संतुलित बना हुआ है। मीडिया व्यवसायीकरण एवं पूंजीवाद के बीचों बीच सत्ता के अनुकूल कवरेज़ करते हुए मान मर्यादा, मनुष्यता, सत्य, असत्य आदि की परवाह नहीं करता। वह वही खबरें प्रसारित करने में रुचि रखता है जो सत्ता पक्ष के अनुकूल रहें। 

यह कोई दावा नहीं है। मैं गलत भी हो सकता हूँ। यही सब विचारों से जूझते हुए मैंने नोम चोम्स्की की पुस्तक Manufacturing Consent पढ़ने उठा ली। चोम्स्की अपनी वैचारिकी एवं अध्ययन से यह समझाने का प्रयास करते हैं कि प्रजातांत्रिक राष्ट्रों में मीडिया कभी भी स्वतंत्र नहीं रह सकता है। इसके वरन् मीडिया जनता के मध्य कत्था, पान, सुपाड़ी के साथ सफेद चूना सहलाते हुए स्वयं क कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देते हुए प्रशासन या शासन को पब्लिक की "सहमति" (consent) बनाकर निर्मित (manufacture) करता है।

तस्वीर गूगल से साभार 


आसान शब्दों में कहा जाय तो मीडिया व्यवसायियों एवं प्रशासन के हित में ही कार्य करता है। इसके पीछे भी कई कारण है। जिन्हें जानना बेहद आवश्यक है। चोम्स्की ने इस पुस्तक में निम्न पांच बिंदुओं पर जोर देते हुए इन कारणों को स्पष्ट किया है। जिसमें पहला एवं प्रमुख बिंदु है स्वामित्व (Ownership) चूंकि मीडिया इंडस्ट्री में मालिकाना हक़ रखने वाले पत्रकार कम होते हैं बल्कि बड़ी कंपनियों को रन करने वाले व्यापारी होते हैं। जिनका दखल सरकार में भी हो सकता है। बिजनेसमैन समाज सेवा करने तो कोई कम्पनी चलाएगा नहीं। बिना लाभ के वह पत्रकारिता की चुनौतियों से जूझने के लिए मीडिया कंपनी नहीं खोल सकता। इसलिए मीडिया का स्वामित्व किसी बड़ी मछली के हाथ में रहे यह मीडिया के ऑपरेट होने में बड़ी भूमिका निभाता है।

दूसरे बिंदु पर वे विज्ञापन (Advertising) पर बात रखते हुए लिखते हैं कि विज्ञापन किसी भी मीडिया की अर्निंग का सबसे बड़ा स्त्रोत है। इसलिए साबुन, तेल, मसालों से लेकर चड्डी बनियान, निरोध आदि के विज्ञापनों से लदे हुए न्यूज पेपर्स का काम लुगदी एवं रद्दी बनने हेतु रह गया। डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तो इसमें सबसे आगे हैं। विज्ञापनों की लोलुपता से प्रभाव यह पड़ता है कि बड़ा आदमी अधिक खर्च करना चाहता तथा छोटा आदमी बड़े सपने सजाता है। हालांकि किसी भी मीडिया संस्था की मुख्य आय स्त्रोत विज्ञापन ही हैं। परंतु कार्मिक सुचिता का पालन करना किसी भी मीडिया संस्थान का कर्तव्य भी है।

तीसरे नंबर पर वे मानते है कि स्रोत (Sourcing) राजस्व मीडिया का मुख्य घटक है। इसलिए विज्ञापन प्रदान करने वाली कम्पनियां खर्चीले दर्शकों की ओर लक्ष्य करते हैं, इसलिए विज्ञापन सामग्री को उनके अनुसार परोसा जाता है। इसके अलावा सरकार भी अपनी चीजें मीडिया संस्थानों पर थोपती है। 

चौथा नंबर बेहद प्रमुख एवं प्रभावित करने वाला है। फ्लैक (Flak) दबाव से बचने के लिए मीडिया मुख्यधारा से भटकता नहीं। फ्लैक फिल्टर प्रोपगैंडा मॉडल का वह फिल्टर है, जो नकारात्मक प्रतिक्रियाओ या दबाव के माध्यम से मीडिया को नियंत्रित करता है। फ्लैक का मतलब है शक्तिशाली संस्थाओं (सरकार, कॉर्पोरेट, लॉबिंग ग्रुप्स) द्वारा उत्पन्न आलोचना, मुकदमे, बहिष्कार या धमकियाँ। मीडिया इनसे बचने के लिए मुख्यधारा से विचलित होने से डरता है।

पांचवां है वैचारिक नियंत्रण (Anti-Communism) जिसे "आतंक के खिलाफ युद्ध" जैसी विचारधारा मान सकते हैं। मीडिया हर मुद्दे को "हम बनाम वे" के फ्रेम में रखता है, जिससे आलोचना को "गद्दार" या "राष्ट्र-विरोधी" करार दिया जा सके। मीडिया के अहलेखनाओ की आलोचना करने वाले राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिए जाते हैं। सत्ता के हितों की रक्षा करने में यह सबसे कारगर हथियार है। 

देखा जाय तो सरकार सौर्यमंडल के समान होती है। इसमें कई ग्रह रुपी घटक शामिल होते है जो इसके क्रियान्वयन के लिए सहायक होते है। आज मीडिया स्वयं इस सौर्यमंडल का हिस्सा बनती जा रही है। उसका कोई ईमान धर्म , उत्तर दायित्व नही रह गया। वह मंडल की आभा में खुद को सहज महसूस कर रही है। यह सौर्यमंडल समय समय पर बदलता रहेगा और मीडिया भी अपना स्थान मंडल में निश्चित करती रहेगी।

हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी मीडिया संस्थानों ने यही एजेंडा अपनाया होगा। कुछ होंगे जो जाबांज, बहादुर एवं कर्तव्यनिष्ठ होंगे। परंतु बेहद कम एवं लुप्तप्राय होंगे। जो झुकेंगे नहीं तो कटेंगे सर से बचने के अमूमन मीडिया संस्थानों ने हथियार डाल रखें हैं। फिर भी कुछ अपवाद हो सकते हैं। आवश्यक नहीं चोम्स्की की दी इस अवधारणा को हम आत्मसात करें या सिरे से नकार दें। देश में हर तरह के विचार का सम्मान तो होना ही चाहिए। अब दर्शकों को भी यह समझने की आवश्यकता है कि उन्हें क्या देखना चाहिए, क्या समझना चाहिए और किन चीजों से इनफ्लुएंस हुए बचना चाहिए। न्यूज़ एजेंसीज को अपनी व्यक्तिगत राय दर्शकों पर जबरन थोपने का कोई हक नही है। दर्शक स्वयं ही तय करेगा की क्या देश हित में सही है और क्या नही।

- अग्निमय

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