Friday, February 27, 2026

सिस्टम के करप्ट कृत्यों की बखिया उधेड़ती "Kennedy"

केनेडी देखी... 
कश्यप और उसके प्रोड्यूसर्स की कई सालों की चप्पल घिसाई के बाद सिस्टम की करप्ट कृत्यों की बखिया उधेड़ती यह फिल्म ओटीटी रिलीज़ ही हो सकी. ओपनिंग थॉट यह है कि इस फ़िल्म से कुछ अधिक की उम्मीद थी. उसका रीज़न Rorschach के जैसा मास्क पहने फ़िल्म का हीरो राहुल भट था. राहुल मेरे पसंदीदा अभिनेताओं में से एक रहे हैं. उसका रीज़न रहा है. उनकी करिश्माई आँखें. आंखों से कथानकों के बिंब दिखलाकर जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर सके. वो चमत्कारी आँखें जैसे इरफ़ान साब के पास थी. फहद फ़ाज़िल के पास हैं. राहुल भट के पास भी हैं. डीसी यूनिवर्स का मैं बचपन से ही फैन रहा हूँ. कश्यप ने बताया कि केनेडी उन्होंने चियान विक्रम को ध्यान में रखते हुए लिखी थी. व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगा कि ये भावेश जोशी जैसे सुपर हीरो लीग की फ़िल्म होगी. परंतु ऐसा कुछ भी नहीं है. इसलिए आप उदय शेट्टी उर्फ केनेडी के किरदार से ऐसी कोई उम्मीद लगा कर फ़िल्म ना ही देखें तो बेहतर होगा. 

फ़िल्म का पोस्टर गूगल से साभार

यह फ़िल्म जिस भी लीग की है. उस लीग की फिल्में भारत में अगर बनेंगी तो केनेडी जैसा ही उनका हाल होगा. ना थियेटर में रिलीज़ हो सकेंगी. ना प्रॉपर स्क्रीन्स मिलेंगी. भले ही देश विदेश में यह फ़िल्म स्टैंडिंगओवेशन और तारीफों के पुल पर चढ़ती चली आई हों. पर यहां घर की मुर्गी दाल बराबर भी वैल्युएबल नहीं रह जाती है.

हालांकि केनेडी की कहानी कोई यूनिक नहीं है. बरसों से ऐसे विषयों पर कलम चली है, फिल्म्स बनी है. इसे विशेष बना देता है इसका ट्रीटमेंट जो कि प्रशासनिक मायाजालों के गंदे गटर में घुसे व्हाइट कॉलर्स लोगों की सड़ांध भरे जीवन को अलग अंदाज में ऱफ़ू करता है. यही इसकी विशेषता भी है.

फ़िल्म का बैकग्राऊंड संगीत अत्यंत रोचक है. विशेषकर ट्रैक "The Sound Of Kennedy" जो प्योट्र इलिच तchaiकोवस्की (Pyotr Ilyich Tchaikovsky) ने सुव्यवस्थित किया है.  अन्य ट्रैक्स में बॉयब्लैंक (Boyblanck), शाश्वत द्विवेदी और आमिर अजीज (युवा कवि) का योगदान है.  "मेरा महबूब" के नाम से एक शोक गीत कहानी को इन्हैंस करता है. मुझे यह भी लगा कि कई दफा संगीत फिल्म की कहानी को ओवरलैप भी करता है.



अन्य कलाकारों का काम मुझे उतना अधिक प्रभावित नहीं कर सका. सनी लियोन का किरदार चार्ली होता या नहीं होता उससे अधिक प्रभाव नहीं पड़ने वाला था. अभिलाष थपलियाल, मोहित तकलकर, आमिर दलवी, वैसाख शंकर आदि कलाकारों का काम जितना था उतना था. ना अधिक अच्छा ना बहुत खराब. 

कोविड के आस पास बनी यह फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी उम्दा है. कुछ शॉट्स कमाल शूट किए गए हैं . फ्रेमिंग कमाल है. मेकिंग के तौर पर काफी कुछ सीखा जा सकता है इस फ़िल्म से .

इन सभी विशेषताओं के बाद भी फ़िल्म भरी हुई नहीं लगती यह इसकी कमजोरी है. कश्यप की फिल्म्स की USP उसका कलेवर स्क्रीन का भरापन है. जिस जॉनर की यह फिल्म है उसके पक्ष में यह दलील दी जा सकती है, कि इसकी आवश्यकता नहीं रही होगी. परंतु दर्शक के तौर पर मुझे इस चीज की कमी लगी.

केनेडी के बाद राहुल भट को अच्छे रोल्स करते हुए देखने का मन है. उम्मीद है फ़िल्म इंडस्ट्री उनकी योग्यता के अनुरूप उन्हें अच्छा काम प्रोवाइड करेगी. अनुराग कश्यप से हमेशा ही बेहतर की उम्मीद रही है. कई सालों से निर्देशक के तौर पर उनका काम जमा नहीं. फिर भी उनकी कलम से अच्छी कहानियां निकले जिससे अच्छा सिनेमा देखने मिले. इसी उम्मीद के साथ... इति!

-अग्निमय

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