मीडिया आज और आज...
आदरणीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने कहा था " पत्रकार को सदैव विपक्ष की सीट पर होना चाहिए "। इस कथन से उनका आशय यह था कि सत्तारूढ़ पार्टियों के क्रियाकलापो , उनकी रणनीति, घोषणाएं एवं फैसलों इत्यादि पर पत्रकार की पैनी नज़र होनी चाहिए। पत्रकार की चिंतन की परिधि में सरकार के द्वारा समाज के लिए उठाये कदमो के विश्लेषण में तार्किक प्रश्न कैसे प्राप्त हो सके यह होना चाहिए। सरकार की उपलब्धियों पर जानकारी देने से अधिक महत्वपूर्ण है कि सरकार की खामियों को जनता एवं सरकार के सामने लाकर उसे पल प्रतिपल कर्तव्यों का भान कराना चाहिए।
पत्रकारिता का स्वर्णकाल कभी देखा ही नही गया। यह विडंबना रही है कि आज पत्रकारिता निचले स्तर तक जा पहुंची है। कई बड़ी न्यूज़ एजेंसीज स्वयं को बेच चुके है। यह जमाना राजनैतिक चाटुकारिता का रह गया है। जो पत्रकार राजनेताओं के आगे पीछे घूम कर उन्हें अपने समाचार पत्र या अख़बार में नायक बना देता है श्रीमान की विशेष कृपा उस पर हो जाती है। आज पत्रकारिता का परिवेश इस स्तर तक गिर चुका है की उसे पत्रकारिता का मूल भूत नियम ही भूल चुका है। वह उन सभी नियमो की अवहेलना कर अपनी ही धुन में टीआरपी बटोरने में लगी हुई है।
आज बड़ी खबर बॉलीवुड की फिल्मों की तरह रिलीज की जा रही है। जैसे फिल्मों में मसाला मिलाकर उसे हिट कराने का प्रयास किया जाता है जिससे बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ज्यादा से ज्यादा हो सके । इसी तरह न्यूज़ चैनल भी टीआरपी यानी अपना बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बनाने की कवायद में जुटे दिख रहे है जो की निंदनीय एवं चिंताजनक है। बड़े बड़े एयरकंडिशन कमरों में बैठकर जो खबरे बनाई जाती है उनकी तुलना में ग्राउंड लेवल की रिपोर्टिंग शून्य हो चली है। किसी सोसाइटी में क्या समस्याएं है, किस गांव में बिजली की समस्या है, गली मोहल्लों में नालियों की सफाई हुई या नही इत्यादि मूल भूत आवश्यक खबरों से समाज वंचित है।
वर्तमान से अधिक इतिहास पढ़ाया जा रहा है। न्यूज़ एंकर बदतमीज होते जा रहे है। खबरों से ज्यादा हो हल्ला मचाया जा रहा है। प्राइम टाइम डिबेट में हिन्दू मुस्लिम समाज ही चर्चा का विषय रह गया मालुम पड़ता है। प्रतिदिन देश के चाटुकार न्यूज़ चैनल्स में हिन्दू एवं मुस्लिम समाज का एक प्रतिनिधि, राजनैतिक दलों के प्रवक्ता एवं एक ऐसे अधिवक्ता, शिक्षाविद् जिन्हें बोलने का मौका ही नही दिया जाता मौजूद होते है। यह समाज के ठेकेदार सिर्फ एक चैनल में नही सभी चैनलों में जा कर बेतुकी बातें बोलते है, आपस में झगड़ते है फिर बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे प्रोग्राम खत्म हो जाता है। अब जनता भी हिन्दू मुस्लिम डिबेट एवं झगड़े हो हल्ला देखने की आदी हो चुकी है। अगर किसी दिन वह यह सब नही देखती तो कुछ सूनापन महसूस होता है। परन्तु इन सबके पृथक आवश्यक यह है कि न्यूज़ चैनल सामाजिक समस्याओं को जनता एवं जन प्रतिनिधियों के सामने लाये, गरीब व्यक्ति जब भी न्यूज़ चैनल या अखबार पढ़े तो उसे यह ना महसूस को की खबरे तो सिर्फ उच्च वर्ग के लोगो के लिए होती है। उसे खबरों में अपनापन लगे वह समस्याओं के साथ खुद को जोड़ सके। एवं जन प्रतिनिधि, अधिकारी समस्याओ का निदान कर सके इस हेतु प्रयास होना चाहिए।
पत्रकारों में परस्पर सहयोग होने की भावना खत्म हो चुकी है अब जमाना प्रतिस्पर्धा का है। इस गलाकाट प्रतियोगिता के दौर में स्वयं को नम्बर एक कैसे बनाना है इस पर सारी कवायदे जा पहुंची है। यह गलत धारणा है, दर्शक को जिसमे उसकी अपनी बात दिखेगी जिसमे उसे यह महसूस होगा की हां ये मेरे घर की समस्या है, या यह की यह तो मेरे ही बारे में है वह उस तरफ ही झुकेगा। उसे बढ़ावा देगा व सराहेगा। पर दर्शक भी आज कल भ्रमित होकर न्यूज़ एजेंसीज के माया जाल की चकाचौंध में फँसता हुआ नज़र आ रहा है। वह तथ्यों को समझना ही नही चाहता। वह प्रमाणों को नही आवाजो पर अपनी राय बना रहा है। और यह सब उन्ही पदलोलुप, स्वार्थी मीडिया की देन है।
पत्रकारिता कोई सरल पेशा नही है। एक पत्रकार के अंदर साहस, निर्भीकता, जुझारूपन बुद्धिमत्ता एवं ईमानदारी होनी चाहिए। इस पेशे में राजनैतिक खतरों के साथ साथ कई सामाजिक खतरे भी समय समय पर उत्तपन्न होते रहते है जिनका सामना करते हुए पत्रकारिता करनी होती है। परन्तु कुछ हथियार डाल देते है तो कुछ सत्ता पक्ष में स्वयं को सम्मिलित कर लेते है। एवं सत्ता की मलाई को चाटने लग जाते है।
सरकार सौर्यमंडल के समान होती है। इसमें कई ग्रह रुपी घटक शामिल होते है जो इसके क्रियान्वयन के लिए सहायक होते है। आज मीडिया स्वयं इस सौर्यमंडल का हिस्सा बनती जा रही है । वह खुद को बेच चुकी है। उसका कोई ईमान धर्म , उत्तर दायित्व नही रह गया। वह मंण्डल की आभा में खुद को सहज महसूस कर रही है। यह सौर्यमंडल समय समय पर बदलता रहेगा और मीडिया भी अपना स्थान मंडल में निश्चित करती रहेगी। परन्तु आज भी कुछ पत्रकार एवं न्यूज़ चैनल गणेश शंकर विद्यार्थी जी की कही उस बात पर कायम है एवं सरकार एवं समाज को आइना दिखाने का प्रयास कर रहे है। इनका यह प्रयास सराहनीय है एवं सामाजिक जागरूकता की भी आवश्यकता है।
मयंक रविकान्त अग्निहोत्री