गति अवरोधक ●●●
दृश्य - ??
(चाय की टपरी) दिन - एक्सटीरियर
चाय की टपरी के सामने एक बेंच पड़ी है। उसमे दो नवयुवक विराजमान हैं। जिसमे पहला लेखक है और दूसरा आलोचक।
आलोचक : ( लेखक से )
"तुम ससुर के नाती कोई कहानी कब लिक्खोगे...??
तुमको बड़ा ओक्के रिपोर्ट राइटर माना था, पर अपना कोई खास साहित्य तो तुमने पढ़ाया ना अब तलक... !!
लेखक : ( आलोचक से )
"कहानियों में शेक्सपीरियन ट्रेजेडी का पुट ढूंढने वाले,
दो कौड़ी की कला के कलाकार - मिस्टर 'रेशनलाल मंदबुद्धि प्रसाद'...।।"
आलोचकों की गैंग में सामूहिक गुत्थम गुत्था होकर, लीक से हटकर कहानी लिखने वाले लेखकों को तुम सब, खुले साँड़ की माफ़िक इस्क्रिजोफ़ीनिया का मरीज घोषित कर देते हो। उसकी कहानी को, कहानियों की बिरादरी से बाहर कर देते हो। और यहाँ मजा लेने के लिए, मुझपर कटाक्ष पेले पड़े हो..!!
आलोचक :
विदेशी साहित्यिक खेतों से चोरी का साहित्य खोंटने वाले ईडिपस काम्प्लेक्स से ग्रसित, दिल - दिमागी रासायनिक लोचे के बाद सायनिक स्वघोषित लेखक महोदय।आलोचना से जब फटती है, तो लिखते काहे हो..!!
लेखक :
फटती आलोचना से नही, तुम जैसे दो का चार, तिल का ताड़ करने वाले, साहित्य के धर्मकांड से लेकर मर्मकांड तक के विशेषज्ञों से है। तुम्हारी जात का पिंडदान मारूँ..।
औकात क्या है तुम्हारी। तुम जैसे लोग पेट भर खाने के बाद खाने की आलोचना करते हो, लेखकों की कूट से बच जाने के बाद, बचाने वाले मित्र की आलोचना करते हो, बीवी के नाक, कान, होठ की आलोचना करते हो और मैथुनोत्तर, मैथुन की आलोचना करते हो।
तुम साले क्या ही हो...?
एक कलमतोड़, जलनखोर चवन्नी छाप इंसान।।
आलोचक :
और तुम क्या हो..?? एक अलाल आलसी , अश्लील कहानीकार। जो काफ्का, ब्रेख्त, चेखवादि से लेकर केशव पंडित आदि के साहित्य से मंझी, सजी हुई, प्रभावित, सम्बंधित अंधी तुक्की कहानियां चेंपता है।
बताओ ना असल बात, कहाँ हैं तुम्हारी कहानियां ..??
लेखक :
एक कहानी लिखने के 5 हजार लेता हूँ। तुम साले 500 ही दे दो। कल तक कहानी पढ़ने को मिल जायेगी"
आलोचक :
भांग की भजिया खाकर आया है क्या बे ...??
तेरी कहानियों का, कौन गधे का नाती 5 हजार देगा पाजी। तेरी तरह तेरी बातें भी ईडियाटिक है।
लेखक :
तो सुनो, बेटा रेशनलाल मंदबुद्धि प्रसाद'..।
एक महिला डॉक्टर मेरे प्रेम में बीमार है। मैंने उसे चमत्कारी चुम्बन की विद्या सिखाई है। आफ़्टर चुंबन...
वह अपने सीने में मेरा सिर छिपा लेती है। उसके जन्नती, नाज़ुक दो टीलों के तिलिस्म में मेरी बुद्धि भी क़ैद हो चुकी है।
मेरी कहानियों की शुरुआत अब, औरतों के वक्षस्थल से शुरू होकर उनके गर्भस्थल पर ही ख़त्म होती हैं।
बताइये प्रिय चूतियाजी !! ऐसी कहानियों के 5 हजार बनते हैं या नही....?? डिमांड पर छपती हैं मेरी कहानियां, मुँह से लार टपकाते, दृष्टि सम्भोग करते, चाव से पढ़ते हैं लोग और तब जाकर बड़ा सा चेक प्राप्त होता है।
चाय वाला :
अरे ....ओ... पोथी मास्टरों...
तुम्हारा बड़ा सा चेक, जब भंज जाए और जब पिछला हिसाब - किताब चुकता हो जाए, तब यहाँ दर्शन दीजो।
अभी छाती पर मूँग ना दलो।
पहली फुर्सत में निकल ल्यो !!
फेड आउट

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