Tuesday, June 23, 2026

"आस्तिक बनाम नास्तिक"

 जाबालि -  हे रामचंद्र ! आप अपने भ्राता भरत के निवेदन को स्वीकार कर वापस क्यों नही चले जाते ?

राम ~  ऋषिवर ! मैं अपने सदाचारी पिता के आदेश का पालन करने की प्रतिज्ञा कर उनके द्वारा माता कैकेयी को दिए वचनों का मान रखने के उद्देश्य से ही चौदह वर्ष के वनवास में हूँ। मैं वापस नही जा सकता।


श्री राम-जाबालि संवाद

जाबालि - प्रिय राम ! आप स्वस्थ्य चित्त वाले, सभी मनुष्यों में उत्तम, बारह कलाओं से परिपूर्ण,बुद्धिमान पुरुष हैं। आपके मुख से इस प्रकार अनपढ़ लोगों की तरह की बातें शोभा नही देती। स्वयं को कष्ट देकर किसी के वचन का पालन करना कहाँ की बुद्धिमानी है ??


 राम ~ यदि मैं वनवास की अवधि के मध्य ही वापस लौटता हूँ, तब यह मेरे पिता को दिए मेरे वचन एवं मेरी प्रतिज्ञा का अपमान होगा। और ऐसा करना उन यशस्वी पुरुष के मान, सम्मान का निरादर करना होगा। 


जाबालि - वाह राम, अति सुंदर। आपने यह बात खूब कही। 

अरे राम ! इस भौतिकवादी युग में, ये मेरा पिता और यह मेरी माता, ऐसा सम्बन्ध मानकर जो भी इन रिश्ते नातों के मोह पाश में बंध जाता है, वह मनुष्य या तो स्वयं का ही दुश्मन होता है या फिर बुद्धिहीन। मेरी इस बात पर विचार करिए कि भला कौन किसका बना बिगाड़ सकता है ??


एक व्यक्ति जब अपने गाँव को छोड़कर दूसरे गाँव को जाता हुआ मार्ग में विश्राम आदि के उद्देश्य से ठहर जाता है। और अगले दिन उस जगह को छोड़ अपनी यात्रा को आगे बढ़ाता है। उसी प्रकार माता, पिता, सगे सम्बन्धी, धन दौलत के साथ व्यक्ति का सम्बन्ध कुछ समय तक का ही है। बुद्धिमान व्यक्ति इन सम्बन्धों में आसक्त नही होता।


राम ~ ऋषिवर आपकी बातें मुझे चार्वाक मत से प्रेरित लगती है, यदि मैं आपकी बातों पर विश्वास कर वापस लौटने का विचार भी अपने मन में लाता हूँ, तब मैं धर्म के मार्ग का त्यागी कहलाऊँगा और इस अक्षम्य पाप के लिए मैं नरक का अधिकारी बन जाऊँगा। चूंकि मैं धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हूँ, इसलिए वनवास की अवधि पूर्ण करने के पूर्व यह पाप नही कर सकता।


जाबालि -  प्रिय राम !

मनुष्य अकेला जन्मता है और अकेला ही प्राणों का त्याग करता है। आप किस नरक की बात कर रहे हैं ?

मनुष्य का शरीर वायु, पृथ्वी, अग्नि एवं तेज से मिलकर बना होता है। इन चार भूतों के मेल से चैतन्य उतपन्न होता है जिसे लोग आत्मा भी कहते हैं। जब शरीर नष्ट हो जाता है तब उसका चैतन्य भी समाप्त हो जाता है। प्रिय राम ! शरीर ही आत्मा है। जो इन चार तत्त्वों से उत्तपन्न होकर उन्ही में विलीन हो जाती है। 

कहीं कोई स्वर्ग या नरक नही हैं। जो है वह यही हैं, बाकी मात्र कपोलकल्पना है। जब शरीर जीवित रहता है और अनेक प्रकार के कष्टों को सहता है तो उसे ही नरक समझना चाहिए और जब शरीर मर जाता है तब उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है,क्योंकि तब वह कष्ट आदि से मुक्त हो जाता है।  जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है, बाकी सब कल्पना है जिसका आधार अनुमान होता है। 


राम ~  आपने जो भी बातें मुझे प्रसन्न करने के लिए कही हैं, वे धर्म सम्मत नही है। अपने जो कुछ कहा वह  न्यायमार्ग के विरुद्ध हैं। आपकी बातें साधारण है, जिसमे अज्ञान की अधिकता है और इन तथ्यों को  शास्त्रों में कोई स्थान नही दिया गया है। पिताजी के सामने जो मैंने प्रतिज्ञा ली थी,उसे त्यागने से मुझे इंद्र का सिंहासन भी मिले तब भी मैं यह दुष्कर्म नही कर सकूँगा। आपके द्वारा दिए तर्क अधर्म से परिपूर्ण है, इन्हें मानकर मैं अपने स्वर्गीय पिता श्री की आत्मा को कष्ट नही पहुँचा सकता। 


जाबालि -  प्राणी के जन्म में पिता का वीर्य एक कारण मात्र है। आपके पिताश्री को जहाँ जाना था वे अब वहाँ जा चुके हैं। वे अब समस्त प्रकार के कष्टों से मुक्त हैं।अब ना दशरथ आपके कोई हैं, ना ही आप दशरथ के कोई हैं।  मृत्यु प्राणियों का स्वाभाव है। जो कि प्रत्यक्ष रूप से सत्य है। आप बेवजह इन सम्बन्धो में उलझ कर स्वयं को कष्ट दे रहे हैं। 

आपको अयोध्या वापस जा कर अपना राज्याभिषेक कराना चाहिए। अयोध्या की अधिष्ठात्री देवी आपके आगमन की प्रतीक्षा में है। 

राम ! आप राजाओं के भोगने योग्य भोगों के अधिकारी हैं। आप युवावस्था में इस कुमार्ग पर ना चलते हुए अयोध्या नगरी में उसी प्रकार भ्रमण करें जिस प्रकार इंद्र अमरावती में करते हैं। 


राम ~  आपने अपने मन में इन सारी बातों को सत्य समझ कर जड़ कर लिया है। आप जिन बातों को समझदारी एवं बुद्धिमत्ता पूर्ण बतलाते है दरअसल वह सर्वथा अनुचित है। 

आपके बताए धर्म का पालन करने में व्यक्ति तीन पापों से ग्रसित होता है। 

कायिक ( जो शरीर के द्वारा किये जाता हैं )

मानसिक ( जो मन में सोचे जाते हैं )

वाचिक ( जो ज़ुबान से बोले जाते हैं )

और ऐसा करने वाले नीच, निष्ठुर और लोभी कहलाते हैं। जिन्हें मृत्युपर्यन्त नर्क भेजा जाता है। 


जाबालि -  हे राम। सच तो यह है कि इस लोक अलावा अन्य कहीं कोई लोक नही है। जो सामने है उसे ग्रहण करिए, और जो परोक्ष है उसे भूल जाइए। कुछ धूर्तों के द्वारा लिखे गए धर्म ग्रन्थों एवं शास्त्रों की आप बात कर रहे हैं उसमें लिखी बातें अप्रमाणित है। वह सत्य नही बल्कि कल्पना है। जो सम्मुख दिखता है , जिसकी अनुभूति हमारी इंद्रियाँ कर सकती हैं वह ही प्रमेय ( Theorem ) है। जो कि सिद्ध है। इसके इतर अलौकिकता की बातें कुछ चतुर चालाक लोगों के मस्तिष्क की उपज मात्र है। लोगों का धन हरण करना धर्मग्रन्थों की रचना का प्रमुख उद्देश्य है। 

यज्ञ, पूजा, व्रत, तपस्या आदि विधि विधान उनके द्वारा लोगों को ठगने एवं अपनी जीविका चलाने के लिए ही बनाये गए हैं। समझदारी यह कहती है कि हमे इन सब उपक्रमों को समझना चाहिए एवं इनसे निकलना चाहिए। 


राम ~ जाबालि ! आप धर्म मार्ग से भटके हुए चार्वाक जैसे अधार्मिक मत का पालन करने वाले नास्तिक है।     पूर्व में वशिष्ठ आदि कई ऋषियों एवं ब्राम्हणों ने शुभ कर्म किये, तप किया एवं सत्य,अहिंसा, परोपकार को बढ़ावा दिया।  मैंने जो शिक्षा प्राप्त की है उसके अनुसार, धर्म एवं सत्य का पालन करना सभी धर्मों से बड़ा धर्म है। 

और धर्म ग्रन्थों एवं वैदिक शास्त्रों में इसका प्रमुख वर्णन मिलता है। जिसका पालन पूर्व काल से कई महापुरुष करते आ रहे हैं। मैं उनके इस कार्य को आदर देता हूँ, एवं उनके दिखाये मार्गों पर चलने का प्रयास करता हूँ। 

जो व्यक्ति सत्य एवं धर्म का पालन नही करता उसके  भोग को देवता एवं पितृ तक ग्रहण नही करते। 


जाबालि -  हे राम ! जो लोग सामने से आते सुख को त्याग कर भविष्य में मिलने वाले सुख की कामना में धर्म का पालन करते हैं एवं ऐसा करते स्वयं को समाप्त कर लेते हैं, मुझे उन लोगों पर तरस आती है। जो धार्मिक कार्यों में लिप्त होकर इस लोक में कष्ट भोगते रहते हैं।


जो लोग पितरों के श्राद्ध आदि कर उन्हें भोग लगाते हैं वे सिर्फ और सिर्फ अन्न की बर्बादी कर रहे होते हैं।


राम ! क्या कोई मरा हुआ इंसान भोजन कर सकता है ? 

एक तर्क यह भी है कि यदि किसी एक के द्वारा खाया गया अन्न किसी अन्य जन के पेट में पहुँचता। तो राहगीरों को अपने साथ भोजन के पदार्थो को अपने साथ लेकर जाने की क्या आवश्यक्ता थी ?

उनके ही परिवार के लोग उनके नाम से भोजन को घर पर बना कर कर लेते, और वह भोजन राहगीर के पेट तक पहुँच जाता और वह अतिरिक्त भार उठाने के बोझ से बच जाता। 


राम ~ जाबालि !

 सत्य बोलना, अपने वर्ण एवं आश्रम के धर्म एवं नियमों का पालन करना, दुष्टों एवं अधर्मियों से समाज की रक्षा करना, सद मार्गी होना, ब्राम्हणों, अतिथियों एवं देवताओं को पूजना ही स्वर्ग प्राप्ति की सीढ़ियां है। 

ज्ञान, यज्ञ, तप एवं देव जीवन को सुंदर एवं व्यवस्थित ढंग से जीने के तरीके है जिनका पालन करना चाहिए। 


यदि मैं आज तुम्हारी बातों को मानकर अपनी प्रतिज्ञा एवं वचन को भंग करता हूँ, तो प्रजा पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा। उनका विश्वास उनके राजा पर से जाता रहेगा। राज पुरुष होने के नाते आदर्शवादिता के सिद्धांतों का पालन किसी भी कीमत में करना राजा का धर्म होता है। प्रजा अपने राजा के किये कार्यो का अनुसरण करती है। राजा को सदैव महान एवं उच्च आदर्शों एवं उदाहरणों की स्थापना जन सामान्य के बीच करनी पड़ती है। जिससे समाज का क्रियान्वयन सुचारू रूप से चलता है एवं सन्तुलन बना रहता है। 


जाबालि ! जो धर्मानुष्ठान में तत्तपर रहते हैं। जो सत्संगी हैं, जो हिंसा नही करते, दान देने ने जो प्रधान हैं ,जो छात्रों को धर्म की शिक्षा देते हैं वही ऋषि पाप रहित होकर तेज धारण करते हैं एवं संसार में पूज्य होते हैं। 

ना कि तुम जैसे नास्तिक लोग। 

परम श्रद्धेय मेरे स्वर्गवासी पिता आज उपस्थित नही हैं ।

किंतु , हे जाबालि !  मैं अपने पिता के इस कार्य की निंदा करता हूँ, जिन्होंने तुम जैसे भ्रष्ट बुद्धि वाले नास्तिक को अपने यहाँ स्थान दिया। 

राजा को चाहिए कि नास्तिकों को वही दण्ड दे जो दण्ड चोरी करने के बाद चोर को दिया जाता है। और ऐसे नास्तिकों से बात चीत एवं लोक व्यवहार भी समाप्त कर देना चाहिए। 


जाबालि - हे रामचंद्र ! मेरे कहने का अभिप्राय नास्तिकता को बढ़ावा देना नही है। ना ही मैं नास्तिक ही हूँ। ना ही मैं इस बात का समर्थन करता की अन्य लोक एवं धर्म नही है। 

परन्तु परिस्थिति के वश समय समय की आवश्यकतानुसार मैं नास्तिक या आस्तिक बन जाता हूँ। जिसमें मेरी सहजता होती है, जिसे अपनाने में जिस वक्त मैं सुविधा का अनुभव करता हूँ मैं वैसा ही बन जाता हूँ। 

मेरे विचार में आस्तिकता एवं नास्तिकता दोनों का अपना अपना महत्व है। सामाजिक ढाँचे को चलाने के लिए हमे इन सभी पर विचार करते हुए ही कार्य करना चाहिए।

हे रघुवर ! ये समय ही ऐसा था कि मुझे नास्तिकों जैसी बातें एवं तथ्य आपके सम्मुख कहने पड़े। मैंने यह सब आपको समझा बुझाकर अयोध्या वापस लौटाने के उद्देश्य से कहे थे। 


राम ~  (मन में सोचते हुए )

अब इस स्थान विशेष ( चित्रकूट ) 

पर रहना उचित नही। 

शीघ्र ही इस स्थान का त्याग करना होगा। वरना ये मेरे सभी शुभ चिंतक नित्य प्रति दिन आकर मेरा कुशल क्षेम जानने का प्रयास करेंगे। और इससे मेरा वनवास का व्रत भंग हो जाएगा। 


इति!


- अग्निमय

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