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Tuesday, March 17, 2020

तमन्नाओ के दर पर - भाग एक ( लघु उपन्यास )

 यह एक मासूम सी प्रेम कहानी है। जिसमे कई सारे आयाम हैं। जो आपको ...आपके बचपन से लेकर जवानी तक के दिनों की याद दिलाएंगे। गुदगुदाएंगे, रोमांचित करेंगे साथ ही आनन्दित करेंगे। 


ऐसी मेरी अपेक्षा है.. अब मुझे ज्यादा कुछ ना कहते हुए यह लघु उपन्यास का प्रथम  भाग आपको सौंप देना चाहिए। 

आपका 

मयंक अग्निहोत्री 



                      ~ तमन्नाओ के दर पर ~



             "इज़हार के दरमियान दिया गुलाब गुमा नहीं ...

           कभी इश्क़ की किताब के पन्ने पलट कर देखना "



वैसे इस बात पर गौर करना चाहिए कि ईश्वर की नेमत हमारे देश पर थोड़ी अधिक है । तभी उसने इस देश को चार मौसम दिए है। भारत देश उन तथाकथित ठंडे, गरम विकसित राष्ट्रों से मौसमों के मामले में समृद्ध एवं विकसित है।
 हलांकि इतनी इनायतें होने के बाद भी इस देश में सब कुछ अच्छा नही है। कहने का अर्थ है बहुत कुछ अच्छा नही है। मंत्री, संतरी, अधिकारी,बाबू,चपरासी जैसी कुछ विशेष दर्जे की मकड़ियां आमजनमानस को अपने जाल में फँसाना जानती है। कुछ लोग कहते है कि लड़कियां जाल में फंसा लेती है । तो कुछ का यह मानना है कि, लड़के भी जाल में फंसा लेते हैं। कुल मिलाकर यदि कहा जाय तो हम सभी जाल में फँसे हुए या फाँसने वाले लोग है। कौन कितना बड़ा जालसाज है, यह आप मन में लड़कर डिसाइड कर लेना। 
शिक्षा का भी हाल ज्ञानार्थ जाइये, सेवार्थ आइये हो रहा है। तो वहीं उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए फेसबुक, व्हाट्सअप जैसी यूनिवर्सिटी का कारोबार अपने चरम पर है। 

इन जालसाजों, चारासाजों की साजिशों के बीच प्रेम की कहानी बन जाना बेहद ही सामान्य सी बात है। आप एक से कहोगे अगला पूरे मोहल्ले से कह आएगा। परन्तु ये तो प्रेम की बात है ऊधो। आपके प्रेम की कहानी कोई मोहल्ले का फुकरा लौंडा सुनाए इससे बेहतर यह कि आप स्वयं सुना दो।

लगभग छः या सात वर्ष पूर्व जब नेताओं को पप्पू या चौकीदार की उपाधियों से नही नवाज़ा गया था, जब इलाहाबाद के नाम पर प्रयागराज की हरताल नही पोती गई थी। तब उस शहर में तमन्नाओ के दर पर एक प्रेम कहानी का जन्म हुआ।

बात सन 2014 शहर इलाहाबाद के मई के महीने की है। सूरज का पारा अपने चरम पर रहता था। नदी किनारे बसे शहर के मौसमों का हाल अजीब होता है। ठंडी के समय जबर ठंडी, गर्मी के समय अहिमक गर्मी।


अब अगर हम इलाहाबाद को प्रयागराज नही लिख रहे तो भड़क मत जाइएगा, बात उस वक़्त की है जब इलाहाबाद.. इलाहाबाद रहा । लेखक को फील नही आयेगा नये नाम के साथ। थोड़ा सा एडजस्ट तो आप कर ही लेंगे।❣️



मई के महीने में बंकू जी । अपने इलाााहाबा वाले अंकल जी के नये घर के गृह प्रवेश कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे थे। अंकल, आंटी  लगभग पंद्रह दिन पहले से ही उस सँकरी गली के तिमंजिले घर में रह रहे थे। उस पर भी कार्यक्रम गृहप्रवेश का रखे हुए थे। दरअसल भारत में बड़े कार्यक्रमों एवं बड़ी घटनाओं की प्रक्रियाएं एक बार सरकारी प्रक्रियाओं के तहत पूर्ण होती है। फिर उसमें परिपूर्णता लाने के लिए भगवान के घर अर्जी देनी पड़ती है। ये काम पंडित जी लोग आसानी से करा देते हैं। इन्ही सब के तहत अंकल जी के नए घर प्रवेश के कार्यक्रम में शामिल होने इलाहाबाद बंकू जी अपने छोटे भाई के साथ जा रहे थे।

पिताजी ने टिकट जनरल श्रेणी की कटाई। पर स्टेशन में जब ट्रेन का टीसी उनको दिखा तो "आपके ही बच्चे हैं, ननिहाल जा रहे है"  कह के मुफ्त में एस 2 ( शयनयान श्रेणी ) की खाली पड़ी 25 और 26 नम्बर की सीट हथिया ली। उस वक़्त पिताजी पर मपिताजी की शख्सियत को जानता था। यदि कोई ऑटो रिक्शा वाला उनसे ज्यादा पैसे मांगने की हिमाकत करता तो वे उससे कहते
 " स्स्याले... पुलिस वाले को चराता है" ....
अभी वो मार लगाऊंगा की नानी याद आ जायेगी"
हालाँकि पिताजी पुलिस विभाग में नही थे। परन्तु पर्सनालिटी एवं कॉन्फिडेंस ऐसा कि किसी पुलिस अधीक्षक से कम नही लगते थे। रही बात नानी याद दिलाने वाले डायलॉग की तो पिताजी जब कभी मुझे लतियाते तब भी वे यही दोहराते थे। कई बार तो नये - नये डायलॉग सुनने को मिलते थे। हालाँकि मुझे मेरी नानी हमेशा याद रहती थी। पिताजी को इतना तकल्लुफ़ करने की कोई जरूरत ही नही थी।

फिर जब पिताजी ट्रेन के अंदर हम दोनों भाइयों को बैठाने आये तब उन्होंने देखा कि आस पास के सहयात्री काफी उम्रदराज एवं तथाकथित जेंटलमैन लोग है। तब पिताजी ने उन सबसे कहा कि

 " ये दोनों छोटे बच्चे पहली बार अकेले इलाहाबाद तक का सफर कर रहे हैं, जरा इनका ख्याल रखियेगा।"

 मुझे पता था कि हम दोनों भाई । महीने, डेढ़ महीने के लिए इलाहाबाद जा रहे हैं। मन बड़ा प्रसन्न था। पर पिताजी के सख्त चेहरे पर इस तरह के चिंतित भाव... वो भी मुझ जैसे लड़के के लिए, जो कभी उनका दिल जीत पाने में कामयाब नही रहा। हो सकता है उन्हें मेरी अपेक्षा छोटेभाई की चिंता अधिक रही जो क्योंकि वह उम्र में छोटा है। खैर इस पर तुलना करना बेईमानी है। एक कहावत है
 " बाप अपने नालायक बेटे से भी उतना ही प्यार करता है, जितना लायक बेटे से "।
 परन्तु मेरे लिए यह बड़ी बात थी। इसी बीच मैंने पिताजी के जल्दी - जल्दी में तीन - चार बार पैर छू लिए। छोटा भाई जिसकी उम्र बारह वर्ष की थी। उसे विंडो सीट मिल गई थी। वह कुरकुरे खाते हुए फ्रूटी पी रहा था। उसकी अगली तैयारी स्टेशन से ज़िद करके खरीदी गई कॉमिक्स पढ़ने की थी। उसके चेहरे पर कॉमिक्स मिलने की ख़ुशी साफ़ देखी जा सकती थी। ट्रेन के चलने तक पिताजी साथ में बैठे रहे। यह उनकी मजबूरी थी कि वे स्वयं हमें इलाहाबाद व्यस्तताओं के चलते नही ले जा सकते थे। वहीं माताजी एक रिश्तेदार की शादी में गई हुई थी। जाना जरूरी था अस्तु ऐन, केन, प्रकारेण हम दोनों को भेजा जा रहा था । 

हालाँकि मैने कक्षा 12 वीं की परीक्षा हाल ही में दी थी। बड़ा तो हो ही गया था मैं ।
 मुझे सब पता था। कहाँ उतरना है, कहाँ जाना है। चूंकि स्टेशन पर मौसाजी लेने आ रहे थे इसलिए पिताजी आश्वस्त थे। परन्तु उनके लिए मैं नासमझ और नालायक ही था। इसमें उनकी कोई गलती नही थी। मैं ही कभी ऐसी उपलब्धियां प्राप्त नही कर पाया जिससे उनका सिर गर्व से ऊँचा हो जाता। हर वक़्त उनसे आँखे चुराता, उनसे बचता। मैंने जीवन भर पहाड़ खोदे और चुहिया निकाली। जबकि चुहिया पहाड़ के अंदर रह कर खुश थी। मैंने जबरन उसे उसके घर से बेदखल कर दिया। मैंने कभी कोई ख़ुशी का काम ही नही किया था... कभी नही। पर मैं करना जरूर चाहता था।

जब उन सहयात्रियों से पिताजी ने हम दोनों का ख्याल रखने की बात कही तब लगा कि इलाहाबाद जाने से मना कर दूँ और पिताजी के गले लग जाऊँ। जीवन में ऐसे पल बमुश्किल ही आते हैं, जब पिताजी से तवज्जो मिलती है। मुझे यह बात उस उम्र में समझ आ चुकी थी कि लड़कों के जीवन की परम् ख़ुशी तब है जब उनके बाप उनके काम की इज्जत स्वयं करने लगे। उन पर गर्व करने लगें। परन्तु मेरी यह असम्भव सी ख्वाहिश उपजी हुई खूबसूरत उत्तेजना के साथ ही खत्म हो गई।

ट्रेन चली ... खिड़की पर खड़े होकर हम दोनों भाइयों ने... पिताजी को तब तक हाथ हिलाते हुए बाय किया। जब तक वे हमारी आँखों से ओझल नही हो गए।

 इसी बीच बुजुर्ग मंडली आपस में बतियाने लगी। मैं उनकी बातें सुनकर समय काटने लगा.. वहीं पर छोटा भाई अपनी कॉमिक्स में मस्त था।

" ऊ छुट्न का एक्को पईसा का सऊर नही बा। परसो संझा के छत से अपने नाती का लै उतरति रहे, सररु जीना से जो गिरे, सब खूनम, खून, छुट्टन के माथा परे चार टांका आये। भला भा नाती का कछु ना भओ।"

एक बुजर्ग ने बनारसी, इलाहाबादी मिक्स बोली में बात प्रारम्भ की।

"छुट्टन अउ पुत्तन ई दुइनो भाई.....ससुर कौनो के कभौ सगे रहे ?  कभौ ना, गाँव के जमीन खातिर दुइनो भाई एक होइके लठैत बने फिरत रहे। शंखू के 20 डिसमिल जमीन दबाइन, मेड़ जोत लिहिन। फेर दुइनो अलग होइगे। करमन का फल भुगत रहे औ का। "

दूसरे बुजुर्ग ने विषय पर तथ्यात्मक विचार रखते हुए कहा।

उन लोगो द्वारा छुट्टन की बैक बिचिंग को सुनकर कुछ देर बाद मैं बोर होने लगा। मैंने उन लोगों पर से ध्यान हटाया। सूरज डूब चुका था। ट्रेन की खिड़की के बाहर का दृश्य अच्छा लग रहा था। जगह - जगह बत्तियां जल चुकी थी। ट्रेन सरपट दौड़ लगाये जा रही थी। मेरा घर पीछे रह गया, परन्तु पिताजी का वो चेहरा...
उनकी आशंका अभी भी साथ थी। इसीलिए सतर्क था। छोटे भाई को हर पांच मिनट में देखता, की कहीं वह सो तो नही गया, कहीं उसने खिड़की से बाहर हाथ तो नही निकाल लिया। छोटा भाई मुझसे ज्यादा समझदार था। वह कॉमिक्स की रहस्यमयी दुनिया में मगन था। उसमे छुट्टन और पुत्तन जैसे  घनचक्करों का नामोनिशान तक नही था ।
इसी बीच मैंने प्रेमचंद्र की कहानियो की किताब बैग से निकाली और पढ़ने लगा।

लगभग साढ़ेे तीन घण्टे बाद ...इलाहाबाद का रेलवे ब्रिज आया । जिसका इंतज़ार हम दोनों भाइयों को हमेशा रहता था। पिताजी ने हमे सिक्के भी दिए थे, गंगा जी में डालने के लिए। जब ट्रेन पुल से गुज़र रही थी तब मुझे नदी में एक बोट गुजरती दिखाई दी। जिसमे ढेर सारी लाइटिंग थी, उसने मुझे आकर्षित कर लिया। छोटे भाई ने अपना सिक्का फेंका और प्रणाम किया। मैं उस बोट को देखता रहा। नदी निकलने वाली ही थी भाई ने कहा " सिक्का नही फेंकोगे" ?  मैंने तुरन्त सिक्का फेंका वो पुल से टकराकर नीचे गिर गया। तभी बुजुर्ग मंडली में से एक ने कहा...


" छोट ज्यादा समझदार है "


क्रमशः

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अगला अंक बहुत ही जल्द ....



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