"काला कोट"
●●●●●●●●●
रात अँधेरी थी।
पार्क के एक कोने की बेंच पर वो मेरे साथ बैठी हुई थी। मेरा काला कोट, उसकी गोद में रखा हुआ था। उसने मेरे दाएँ हाथ की उँगलियों पर अपने बाएँ हाथ की उँगलियों की मखमली गिरफ़्त मजबूत की हुई थी। उसके दाएँ हाथ की उँगलियों में फँसी हुई अधजली सिगरेट धुँआ छोड़ रही थी।
अँधेरा इतना गहरा था कि करीब बैठे हुए भी हम एक दूसरे को ठीक से देख नही पा रहे थे।
उसने मेरी आँखों को देखने के लिए मेरी कोट की ज़ेब से लाइटर निकाल कर उसे जलाया।
" मेरी आँखे तुम्हारी आँखों से ज्यादा खूबसूरत है"...
उसने मन्द मुस्कान के साथ कहा और अपनी पलकें झुका ली।
नाज़ !
"इन आँखों ने बड़ी लम्बी यात्रा की है। बहुत दूर, पर्वतों, पगडंडियों, शहरों और बस्तियों से लेकर उस ज़माने से इस ज़माने तक अपनी मंज़िल की तलाश में ये दर दर भटकती हुई थक गई हैं। इसी थकान ने इनकी ख़ूबसूरती छीन ली है।"
मैंने भरे गले से उसकी आँखों की तरफ देखते हुए कहा।
" तो क्या इन्हें इनकी मंजिल मिली" ?
"हाँ"
"कहाँ है वो" ? उसने उतावलेपन से सवाल किया।
" यहीं मेरी आँखों के सामने"
मेरे जवाब देते ही, उसकी आँखे चमक उठीं, और उस चमक ने चिनगारी का काम करते हुए दो दिलों की आग को और बढ़ा दिया।
पर इन्ही सबके बीच...
काला कोट जमीन पर गिर चुका था, जलती हुई सिगरेट उसके ऊपर गिरी पड़ी थी, और पार्क में दो दिलों के साथ साथ काला कोट भी जल रहा था।
मयंक अग्निहोत्री✍️©