Thursday, November 15, 2018

व्यंग्य - "चुनाव लीला"

          " चुनाव लीला"

माननीयों को मेरा साष्टांग प्रणाम🙏
 आजकल वे अपने  बिजी शेड्यूल से वक़्त निकाल कर , जनता के बीच उपस्थित हो पा रहे है। मैं हृदयतल से अपनी खुशी जाहिर करते हुए भावुक हो रहा हूँ की हमारे माननीय लोगो के घरों में जा रहे है वो भी हाथ जोड़ कर , इसकी कल्पना तक नही जा सकती की जिनके कार्यालयों के बाहर एक छोटा सा काम कराने के लिये जिन लोगो की लंबी कतारें लगती थी आज उन्ही के घरों में स्वयं इष्टदेव अपनी टोली के साथ दर्शन देने जा रहे है। और वरदान के रूप में अपने झंडे, टोपियां, बिल्ला, लोगो एवं घोषणा पत्र आदि सभी लोगो में बाँट रहे है। भई वाह हमारे देश की जनता की मानो मन की मुराद ही पूरी हो रही है . वो क्या है न पब्लिक को आदत है मुफ्त का कुछ भी मिले , किसी से भी मिले , पर मिले तो सही। इसी का फायदा उठाते हुए  माननीय बड़े गर्व के साथ अपनी ये अमूल्य चीजे पब्लिक में ऐसे बाँटते है मानो प्राचीन काल के राजे महाराजे जनता में सोना , चाँदी लुटा रहे हो। पुरानी कहावत है " मोहब्बत और भक्ति सब्र मांगती है " यह बिलकुल सत्य है। अब यह सब्र का ही तो फल है, की जिनके दीदार या दर्शन की आस में आशिक या भक्तगण लम्बी कतारों में , गाली अपमान सुनते ,अपने अपने काम धंधों को छोड़ कर कड़ी धूप हो या कड़ाके की सर्द बिना किसी की परवाह किये इसी यकीन में खड़े रहते थे की एक न एक दिन तो नजरे चार होंगी  दो बातें तो होंगी । वो एक फिल्म का डायलॉग भी है कि "किसी चीज को अगर शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने के लिए जुट जाती है" यहाँ बिलकुल फिट बैठ जाता है। वैसे मुझे शंका भी  है कि क्या कायनात के पास इतना समय है कि वो आशिकों और भक्तों के लिए काम करे वो भी फ्री में। अरे फ्री में कौन किसी के लिए क्या कर देता है भाई? इंसान खुद से खुद के लिए क्या करता है यह उतना मायने नही रखता। कायनात इंसान के लिए क्या करती है ये अधिक महत्वपूर्ण है खैर अब कायनात क्या करती है क्या नही ये उसका अपना व्यक्तिगत मसला है। मुद्दे पर आते है..  तो बड़ी कठिन तपस्या या बड़ी शिद्दत से की गई मोहब्बत (जो भी आपको आपके अनुसार उचित लगे) का आज यह परिणाम है कि साक्षात् ख़ुदा लोगो के दर पर चल कर दल बल के साथ हल लेकर आ रहा है। अब अँधा क्या मांगे दो आँख, चार कान , बत्तीस टांग । जिस तरह फल की प्राप्ति के बाद लोग संन्घर्ष की कठिनता एवं जटिलता को भूल जाते है उसी प्रकार जनता भी कष्टों को भूल कर माननीयों का स्वागत वंदन एवं अभिनन्दन करती है।
भले भरे बैठें हो कई सालों से पर जब वे आते है तो सब भूली बिसरी यादे बन हवा हो जाता है। और सब अपने अपने तरीको से अपने इष्टदेव या कहे मुहब्बत को प्रसन्न करने या रिझाने में लग जाते है। और हमारे माननीय भी बड़े गर्व के साथ दोनों हाथ जोड़कर  उन्हें  आशीर्वाद देते है। अब जोड़ कर कैसे आशीर्वाद देते है यही तो वो खूबी है जो उन्हें माननीय बनाती है , उनके व्यक्तित्व को समझना इतना सरल थोड़ी न है । वे ऐसे महापुरुष है जो विपरीत धाराओं को अपने अनुसार मोड़ देते है। किसे कब गले लगाना है और कब लतिया देना है यह वे बखूबी जानते है। जनता ठहरी भावुक वो क्या समझे कुछ। प्रेमी और भक्त के लिये आत्मसम्मान जैसी कोई चीज होती ही नही। चाहे कितना भी उसे अपमानित कर दो उसके लिए इबादत करना ही उसका कर्तव्य है । वो घूम भाग कर जहाज के पंछी की तरह वापस जहाज पर ही आएगा। खैर ये सब जो भी है सिर्फ और सिर्फ चुनाव की वजह से मुझे यह भी लगता है कि चुनाव को राष्ट्रीय त्यौहार घोषित कर देना चाहिये, भई जितनी ख़ुशी जनता को होली , दीपावली में नही मिलती उतनी तो इस वक़्त मिलती है। इसी समय उसे यह बतलाया जाता है कि प्रजातंत्र में जनता राजा होती है , आप ही सब कुछ हो , त्वमेव माता च पिता त्वमेव। चुनाव के समय ही वो आम आदमी जिसे खुद के अस्तित्व पर शक होता है कि मै आखिर दुनिया में क्यों हूँ? वही निराश, हताश, मिडलक्लास अचानक से खास बन जाता है।  त्यौहार मनाए ही इसलिए जाते है कि लोगो को खुशियों की प्राप्ति हो सके और भला इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है कि आदमी अचानक से खास बन जाय। अब चुनाव बाद का खेल क्या होता है वो अपनी जगह है । त्यौहार भी तो कुछ ही दिन के होते है पूरे साल थोड़ी न खुशियाँ देते है। यही सिद्धान्त चुनाव पर भी लागू होता है।  चुनाव को त्योहारों की श्रेणी में गिना जाए इस हेतु हम सभी को मिलकर प्रयास करना ही होगा।
रही बात भक्तों और प्रेमियों की यह दोनों अलग अलग विशेषण अवश्य है परन्तु इनका केंद्र एक ही है इनके सिद्धांत एक है जैसे की अपने इष्टदेव या प्रेमी के चरित्र में भूल कर भी संदेह करना पाप है, उनके मन में आपका स्थान क्या है के बारे में पूछने का सोच लेना ही महापाप है। और गलती से भी आपने यह पूछ लिया की मै आप पर सर्वस्व अर्पण कर चुका हूँ बदले में क्या आप भी पूर्णतयः मेरे है? तो इस प्रकार के प्रश्न वर्जित है इससे वे कुपित हो सकते है और आगे की कहानी बड़ी गम्भीर हो सकती है जिसका परिणाम जेल या मयखानों में शराब की बोतलों के बीच खत्म होता है।
आप यह सोच ले की आप अकेले प्रेमी या भक्त है तो यह आपकी सबसे बड़ी भूल हो सकती है। इसके लिए सदैव तैयार रहे क्योंकि जब असलियत पता चलेगी तब बड़ा दुःख पहुंचेगा। कौन कब किसका हो जाय या कौन कब किससे रूठ जाए इसकी कोई गारंटी नही है। यहाँ सिर्फ और सिर्फ फायदा देखा जाता है उसके लिए दुश्मनों को गले लगाना पड़े या दोस्तों को दुश्मन बनाना पड़े सब जायज है। कृपया ध्यान रखे की हृदय ना टूटने पाये क्योंकि आपके हृदय को जोड़ने इनमें से कोई आगे नही आने वाला है। खैर जो भी हो सूचना आपको दे दी गई है बाकी आपके अपने विचार,  वो कहावत है न की सुनो सबकी पर करो अपने समझ की तो बस ना।
हां एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह की मुहब्बत  या भक्ति अपने अपने पंथ सम्प्रदाय के लोगो से ही करना नही तो बहुत खतरे है। गुट बना लो एकता में शक्ति है नही तो धर्म विरोधी कहलाओगे। अब भाई कोई साधु अल्लाह की तपस्या तो नही करेगा की अल्लाह आकर उसको दर्शन दे दे। या कोई मौलवी मस्जिद से राम राम तो  चिल्लायेगा नही। सबके अपने अपने मजहब है , और धर्म पर कुछ नही बोला जा सकता एक हिन्दू अनपढ़ व्यक्ति ने जिसने भगवत गीता एवं कुरान शरीफ दोनों का काफी अध्ययन किया हुआ था उसने एक सभा में कह दिया की गीता और क़ुरान कई जगहो पर एक ही बात कहती है दोनों कई जगहों पर एक मत रखती है, बस इतना उनका कहना था और उड़ता हुआ एक जूता उनके मुंह पर आकर लगा, बेचारे दर्द से बिलबिला ही रहे है कि उसी व्यक्ति ने जोड़ी पूरी करते हुए दूसरा भी फेंक मारा उसके बाद तो जूते पर जूते। और यही वाकया एक मुस्लिम मौलवी के साथ हुआ जो की एक नम्बर का जाहिल और गंवार किस्म का व्यक्ति था उसने गीता का अध्ययन किया और एक दिन मुस्लिम समाज की मीटिंग में यही कहा कि दोनों पाक ग्रन्थ कई जगहों पर एक समान है हम सभी को गीता भी अवश्य पढ़नी चाहिए इतना कहना हुआ की पूरी जनता उन पर पिल पड़ी। कई महीनों अस्पताल में भी रहे। फिर उन दोनों अनपढ़ और जाहिल इंसानों ने तौबा कर ली। तो भैया कहने का मतलब इतना ही की अपनी अपनी टीम में रहो चुनाव में वोट भी उसको करो जो तुम्हारी धर्म और जाति का हो भले उसके अंदर सत्ता संभालने का हुनर न हो, भले उसकी निर्णयन क्षमता शून्य हो पर अपनी टीम का है तो उसी को ही सपोर्ट करना नही तो बाद का तो तुम सबको मालूम है ।

    मयंक अग्निहोत्री ✍️🖋️

No comments:

Post a Comment

मीडिया आज और कल

कुछ दिनों पहले बड़े भैया से कॉल पर बात हो रही थी। उन्होंने बताया इन दिनों वे न्यूज डिबेट के रंगारंग कार्यक्रम का आनंद उठा रहे हैं। कहीं कोई ...