Thursday, April 11, 2019

व्यंग्य - तिकड़म

                               { तिकड़म }





ठीक तो कुछ नही है, और कभी था भी नही। आज़ादी के बाद भी लोग आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। अंग्रेजो से जब आज़ादी मिली तो लगा की हम आज़ाद हो गए। सारे बलिदानियों की शहादत काम आई। पर ये आज़ादी वो आज़ादी नही थी जो आज़ादी देश के लोगो को चाहिए थी। शायद इसीलिए उस वक़्त पाकिस्तान बनाया गया कि वो , वो आज़ादी लेंगे जो असलियत में उनकी आज़ादी है। पर हुआ उल्टा ही आज पाकिस्तान के लोग भी आज़ाद नही रहे। हिंदुस्तान में तो हर जिले में लोग आज़ादी की मांग कर रहे है। महानगरों में बड़े स्तर पर लोगो को आज़ादी चाहिए। और जे एन यू वालो के तो मसले ही अजीब हैं।

ये अपनी विचारधाराओं को अपनी आजादी का घटक मानते है । इन्हें लगता है कि इनके आद, वाद लागू होने के बाद इन्हें आज़ादी मिल जायेगी। पर ससुर इनको यही नही पता की रहोगे तो बन्धन में ही ना। विचारधारों में जकड़े रह कर कौनसी आज़ादी पा जाओगे । लेफ्ट, राईट सब पैरों की बेड़ियां ही तो है ।
पता नही आज़ादी के क्या मायने है मेरे देश के लोगो के लिए। पहनावे से आज़ादी, विचारो से आज़ादी, संस्कारो से आज़ादी, मनुवाद से आज़ादी, ब्राम्हणवाद से भी आजादी, कुछ को समाजवाद से भी आजादी चाहिए तो कुछ परिवारवाद से आजाद हो जाना चाहते हैं। नंगा घूमना यदि आजादी है तो हम प्रागैतिहासिक ही ठीक थे। नॉन सेपियन्स तो हम अब होते ही जा रहे हैं।

शायद देश का मुख्य मुद्दा आज़ादी को घोषित कर देना चाहिए और गहन अध्ययन होना चाहिए की लोगो को कौन सी आज़ादी चाहिये।
कुछ अपनी कट्टरता के बल पर आज़ादी चाहते है तो कुछ उदारवादी धरना एवं प्रदर्शन कर आज़ादी की मांग करते है। पर। ये उदारवादी भी आजकल खतरनाक बनते जा रहे है। इनमे से कुछ मार्क्स के डाई हार्ड फैन है तो कुछ चे ग्वेरा के । पर भारत के महापुरुषों को तो ये कुछ समझते ही नही। हद तो तब हो गई जब मेरे एक बाएं हथिये मित्र ने मुझे बतलाया की भारत के लोग जिन्हें महान पुरुष मानकर पूजते है असल में उनकी मेधा का विकास पश्चिम के किसी भी विद्वान जैसा हुआ ही नही। भारत के विद्वानों ने अपनी खिचड़ी अपने घर पर ही पकाई और लोग उनको महान बोलने लगे, जबकि विदेशी विद्वान भविष्य  देखने की क्षमता रखते थे।

उनकी यह बात सुनकर मै अवाक रह गया लगा की चक्कर मार देगा । परन्तु मैंने उन्हें जब हमारे पुरखों के परिवारवादी सिद्धान्तों, मिल जुलकर त्योहारों को मनाना और वसुधैव कुटुम्बकम आदि के बारे में ज्ञान देने शुरू किया तो वे ऊँघने  लगे। शायद उनपर आज़ादी की नींद का प्रभाव आ गया था।


उन्होंने कई किताबें पढ़ी थी और जो पढ़ लेता है वो बाल की खाल भी निकालना जानता है इसलिए बहस करने से लगातार बचता रहा हूँ मैं क्योंकि मेरे पास मेरा कोई मुद्दा ही नही था है सिवाय रोजगार को छोड़कर। पर जैसे जैसे समझदार होता गया मुझे और मुद्दे मिलते गये ऐसे मुद्दे जिनसे मेरा या मेरे परिवार का कोई दूर दूर तक सम्बन्ध ही नही था वो मुद्दा भी मुझे मेरा मुद्दा लगने लग गया। पर जब ये मुद्दे मेरे व्यक्तित्व पर ही हावी होने लग गये तब जैसे तैसे करके मैंने इन सबसे अपना पीछा छुड़ाया।


अब कुछ भक्ति के सिद्धान्तों पर भी प्रकाश डालेंगे नही तो लोग मुझे ही भक्त साबित कर देंगे।
अब भक्ति का मतलब है सच्चाई और तथ्यों की तिलांजलि देकर , इतिहास और वर्तमान को स्वाहा कर अपने आराध्य के प्रति सब कुछ अर्पण कर देने वाला भाव रखना। भक्ति में दूसरे नजरिये का प्रयोग, देव के देवत्व पर सवाल उठाना आदि सब वर्जित है । यह एक कठिन क्रिया है और जो इसे करते है उन्हें साधुवाद।
परन्तु हमारे बस की ये कभी नही रही!  मंदिर जाकर जल चढ़ा आते है जन्माष्टमी, शिवरात्रि को उपवास रख लेते है यह ही बहुत है परंतु किसी मनुष्य को देवता मानकर उसकी भक्ति हमारे उसूलो के खिलाफ है। 
"अब सवाल की कौन से उसूल! 

तो भाई
सच कहते है उसूलों का तो हमको खुद नही पता बस घर वालो के मुख से बचपन से सुनते आ रहे है और फिल्मो में भी काफी बार सुना इसलिए यह शब्द भा गया इसका कोई पर्यायवाची शब्द भी हमको पता नही इसलिए बचाव के लिए प्रयोग कर दिए। भावनाओ को समझो बाकी शब्द के ब्रम्ह से खुद को बचा कर रखो।
और आखिर में ज्ञान पेश है लेना है तो लीजिये नही तो सरकिये।
किसी भी चीज की अति इंसान को ले डूबती है यही बात आज़ादी और भक्ति के साथ भी लागू होती है। भाई ये हम नही कहते ये माइटी प्रिंसिपल है जिसे तोड़ा, मरोड़ा नही जा सकता। विचारधारों के फेर में उलझने वालो से बचकर रहने में ही सुकून है। आज़ादी एक स्तर तक सभी को प्राप्त है और अनुशासन की डोर का हम सभी के गले में पड़े रहना समाज और इस देश के लिए श्रेष्ठ है। पूछिये उन माँ बाप से जिन्होंने बच्चो की परवरिश मित्र बनकर की और वही मित्र बच्चो ने अपने माँ बाप की बुढ़ापे में कैसी गति बिगाड़ कर रख दी। हम सभी श्यान है, आज़ाद है और इंसान है । किसी भी विचारधारा के गुलाम हम क्यों बनें जब हमारे अंदर ही विराजमान सर्वशक्ति मान है।
" अपनी ढफली, अपना राग है सब अलापते,
  मैं जो सच कह देता हूँ तो सच्चा नही लगता।"
✍️ मयंक अग्निहोत्री**

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