नाटक - "विरासत" / मूल नाटक - (वडा चिरेबंदी)
लेखक - महेश एलकुंचवार
निर्देशक - शुभम बारी
मार्गदर्शन - श्री द्वारिका दाहिया एवं सविता दाहिया
स्थान - विट्स महाविद्यालय , सतना, मध्यप्रदेश
नाटक " विरासत " कई राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। प्रख्यात नाट्य लेखक महेश एलकुंचवार के नाटक " वडा चिरेबंदी " ( ट्रायलॉजी ) का हिंदी नाट्य रूपांतरण है। जिसका निर्देशन मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय में अध्यनरत, थिएटर आर्ट के विद्यार्थी शुभम बारी ने किया है। यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित श्री द्वारिका दाहिया एवं नाट्य संस्था लोकरंग समिति की निर्देशिका श्रीमती सविता दाहिया के मार्गदर्शन में विट्स महाविद्यालय के प्रेक्षागृह में खेला गया।
"वडा चिरेबंदी" नाटक महेश एलकुंचवार की प्रसिद्ध नाट्यत्रयी को एक ही नाट्य प्रस्तुति " विरासत " में समाहित किया गया है। यह नाटक, नाट्य संसार के वास्तविक एवं यथार्थवादी नाटकों की श्रृंखला में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। नाटक एक सभ्रांत खानदानी ब्राह्मण परिवार के सदस्यों की वैचारिक विश्रृंखलता एवं आपसी मतभेद को बेहद ही सहज ढंग से दर्शाता है।
यह बहुचर्चित एवं प्रसिद्ध नाटक है, जिसका देश के विभिन्न स्थानों में वृहद स्तर पर मंचन समय - समय पर होता रहता है।
परन्तु
सतना शहर के रंगमंच में इस तरह का यथार्थवादी नाटक खेला जाना सुखद है।
शहर के नाट्य निर्देशकों में शुभम बारी एक चिर-परिचित नाम है। वे सदैव अपने नाटकों में सृजनपक्ष एवं कलापक्ष को मजबूती के साथ तरजीह देते रहे हैं, एवं अपने विशुद्धि प्रायौगिक नाट्य निर्देशन से दर्शकों को चौंकाते रहते हैं। जिसका परिणाम उनके द्वारा निर्देशित नाटक - "भाड़ से आए हैं, महाश्राप, परसाई की कहानियां" आदि में पूर्व में देखा जा चुका है। सतना शहर में रंगमंच की उत्साहपूर्ण अलख जगाने वाले श्री द्वारिका दाहिया एवं श्रीमति सविता दाहिया के नेतृत्व में शुभम बारी ने सदैव अपने अभिनय कौशल एवं नाट्य निर्देशक के रूप में लोहा मनवाया है। इसी कड़ी में नाटक " विरासत " का निर्देशन उनके द्वारा किया गया है।
इस नाटक के मंचन में निर्देशक शुभम बारी ने प्रयोगधर्मिता के नवीन सिद्धान्त को अपनाते हुए, मंचीय परिकल्पना के क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव किया है। दर्शक इस नाटक को सिर्फ सामने मंच पर देखने के बजाय अपने चारों ओर प्रदर्शित होता देखते हैं क्योंकि नाटक एक नियत स्थान पर नही वरन दर्शकों के चारो तरफ क्रमशः खेला जाता है।
नाटक की शुरुआत प्राँगण के बजाय बाहर लॉन से होती है, जहाँ नाटक का एक किरदार भास्कर जिसके पिता व्यंकटेश उर्फ़ तात्या की आकस्मिक मृत्यु हुई है, वह पेड़ पर घट बांध रहा होता है। घट बाँधने के पश्चात, वह हवेली में ( मंच ) प्रवेश करता है और उसके पीछे पीछे दर्शकों का प्रवेश उस हवेलीनुमा मंच के प्रांगण में होता है। दर्शक किसी प्राचीन हवेली के प्राँगण के मध्य बैठकर, वहाँ रहने वाले लोगों के क्रियाकलापों, आपसी बातचीत एवं वैचारिक द्वंद को सहजता पूर्वक समझ एवं देख सकते है। निर्देशक ने चारों दिशाओं का चतुराई भरा प्रयोग अपने इस वृहद नाट्य प्रस्तुति में किया है। 360 डिग्री परिप्रेक्ष्य दृष्टिकोण को इसमें संविलीन करना, और उसका सफलतापूर्वक मंचन करना जीवटता एवं मजबूत इच्छाशक्ति का कार्य है, जिसे निर्देशक एवं लोकरंग समिति नाट्य संस्था के कलाकारों ने उत्कृष्टता के साथ अंजाम दिया है। शहर के रंगमंचीय इतिहास में इस तरह की नाट्य प्रस्तुति देने के लिए वे सभी बधाई के पात्र हैं।
वक़्त की नदी अपने कर्तव्यपथ पर सदैव गतिशीलता के साथ बहती रहती है। वह कभी एक सी नही होती, कहीं पर वह सीधी सरल धारा में शांत होकर गतिमान होती है, तो जब वह अपने उफ़ान पर होती है तब, कई सारे जड़त्व की प्राप्ति कर चुके पाषाणों के अहम को चूर करती हुई, उनके कणों को साथ बहाती हुई ले जाती है।
यह नाटक भी बदलते हुए वक़्त एवं परम्परावादी विचारों के महीन छिद्रान्वेषण की प्रक्रिया दर्शकों को समझाने का प्रयास करता है। गाँव के देशपाण्डे ब्राम्हण परिवार के तात्या का आकस्मिक निधन हुआ है। तात्या जो कि लगभग 150 वर्ष पुरानी हवेली का मालिक एवं हवेली में रहने वाले परिवार का मुखिया था। मरम्मत एवं देखरेख के अभाव में हवेली जीर्ण शीर्ण हो चुकी है। तात्या के परिवार की बात की जाय तो उसकी माँ जो कि अंधी एवं बहरी है, उसकी पत्नी, उसके पुत्र क्रमशः बड़ा बेटा, भास्कर , मझला सुधीर एवं छोटा बेटा चंदू, तथा एक अविवाहित बेटी प्रभा है।
भास्कर एवं सुधीर की शादी हो चुकी है। भास्कर की पत्नी वाहिनी, एक बेटी रंजू तथा बेटा पराग है। वहीं सुधीर बम्बई में अपनी पत्नी अंजली एवं बेटे अभय के साथ रहता है।
नाटक के कारकुनों ने अभिनय की जिस उत्कृष्टता एवं श्रेष्ठता का परिचय इस नाटक में दिया है, वह सराहनीय हैं। क्योंकि इस नाटक के किरदार निभाने वाले कलाकार एवं नाटक के निर्देशक युवा है और कम उम्र में ही इस तरह की अभिभूत कर देने वाली प्रस्तुति देखकर मन के मयूर नृत्य कर उठते हैं। सभी किरदारों ने रटे रटाये संवाद या बनावटीपन की अपेक्षा प्रतिक्रियात्मक अभिनय शैली को अपनाया है। कलाकारों ने नाटक की भाषा को तो समझा ही साथ ही साथ कथा के मर्म एवं भाव को भी बखूबी आत्मसात किया है। सभी कलाकारों के संवाद सहज स्वाभाविक रूप से सुनाई देते हैं।
तात्या की मृत्यु के बाद नाटक की शुरुआत होती है। बड़ा बेटा भास्कर सूतक के दिनों में पलंग पर पैर पसाकर सोता हुआ दिखाई देता है। पत्नी के टोकने पर भी वह उसे अनसुना कर देता है, क्योंकि वह एक हठी एवं अक्खड़ मिज़ाजी अकर्ता व्यक्ति है। जिसे शेखी बघारने और बड़प्पन का बोझ घर वालो पर लादने की आदत है। भास्कर का किरदार लोकरंग समिति के जुझारू रंगकर्मी अमित कुमार शुक्ल ने निभाया है। अमित लोकरंग समिति के अनुभवी एवं बहुआयामी कलाकार हैं। भास्कर के किरदार को जिस तरह के लिजलिजे एवं बड़बोलेपन की आवश्यकता थी उसे अमित ने बखूबी निभाया है। इस नाटक के किरदार भास्कर के लिए कलाकार ने ठंड में भी अपना सर मुंडवाया है। यह उनके किरदार को करने की निष्ठा एवं प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भास्कर चतुर चालाक व्यक्ति है जिसे मुफ्त की रोटी तोड़ने की आदत है। वह दकियानूसी विचारों वाला व्यक्ति है, जिसे अकर्मण्यता ने उसे इस कदर घेरा हुआ है कि उसकी बुरी नज़र उसके भाई एवं बहनों की संपत्ति पर है।
भास्कर की पत्नी वाहिनी का किरदार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वाराणसी संस्थान से प्रशिक्षित पूजा सेन ने निभाया है। वाहिनी काम काजी घरेलू महिला है, जिसकी दुनिया हवेली और उसके रोजमर्रा की जिम्मेदारियों तक ही सीमित है।अपने पति के निकम्मेपन पर सख़्त रुख अपनाने के बजाय वह उसका साथ देती नज़र आती है, परन्तु जब भास्कर उसे भाई बहनों की संपत्ति को हथियाने की योजना बताता है, तब वह इससे मुक़र जाती है।
पूजा सेन जानी मानी रंगकर्मी है। उन्होंने वाहिनी के किरदार को स्वाभाविक रूप से निभाया है। कई बार कलाकारों को स्वाभाविक किरदार निभाने की जद्दोजहद में अस्वाभाविक चीजें करनी पड़ती है, परन्तु पूजा ने भास्कर की पत्नी वाहिनी के स्वभाव को सहजता के चरित्रार्थ किया है ।
रंजू भास्कर एवं वाहिनी की बेटी है। रंजू का किरदार एकता परिहार ने निभाया है। एकता भी मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित है एवं वर्तमान में हैदराबाद विश्वविद्यालय से थियेटर आर्ट में अध्ययनरत हैं। इस गम्भीर नाटक में रंजू के क़िरदार के चुलबुलेपन के बदौलत बीच - बीच में संतुलित रूप से हास्य समाहित है। एकता परिहार जो की बहु प्रतिभावान एवं मंझी हुई अदाकारा हैं उन्होंने रंजू के किरदार की नब्ज़ को बख़ूबी पकड़े रखा।
रंजू चुलबुली एवं मस्तमौला है। रंजू को घर परिवार से ख़ास मतलब नही है, वह उन्मुक्त रूप से हर उस कार्य का आनन्द लेती है, जिसे करना उसे सुभीता है। उसे फिल्में देखना, अभिनेताओं एवं अभिनेत्रियों के बारे में पढ़ना एवं बातें करना, रेडियो पर गीत सुनना पसंद है। घर के काम काज की उसे खास जानकारी नही हैं। उसके माँ बाप के अत्यधिक लाड़ प्यार ने उसके मानसिक विकास पर गतिरोध लगा दिया है, इसी बात का फायदा उठाकर उसे पढ़ाने वाला मास्टर उसे बहका देता है, जिससे रंजू गलत कदम अख़्तियार कर लेती है, जिसका परिणाम पूरे देशपांडे परिवार को भुगतना होता है।
पराग भास्कर एवं वाहिनी का बेटा एवं रंजू का भाई है। पराग पथ भ्रष्ट, निरुद्देश्य जीवन जीने वाला युवा है। उसके अंदर अवगुणों ने डेरा जमाना शुरू किया है। वह भी अपने पिता की तरह अकर्मण्य है, और अकर्मण्यता अवगुणों की जननी है। जिसके परिणाम स्वरूप उसने शराब पीना शुरू कर दिया है। पराग के किरदार को निभाने वाले अभिनेता नये कलाकार हैं , उनका प्रयास सराहनीय रहा है। परन्तु अभी और कार्य करना बाकी है।
सुधीर स्वर्गवासी तात्या का मझला बेटा है, जिसका किरदार शहर के निखरते, चमकते युवा कलाकार रोहित खिलवानी ने जिया है।
जिया है यह बात रोहित के अभिनय के लिए सटीक बैठती है। रोहित लोकरंग समिति के नए उभरते हुए प्रतिभावान कलाकार है, जो अपने अभिनय में हर बार अपना पूरा जोर लगाते हैं, और यही ख़ास बात उनके अभिनय की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती है। उन्होंने सुधीर के चरित्र के साथ बखूबी न्याय किया है ।
सुधीर जो की बम्बई में रहता है और तात्या के अंतिम संस्कार के बाद पत्नी संग हवेली पहुँचता है। सुधीर का किरदार प्रगतिशील के साथ साथ महत्वाकांक्षी भी है। बम्बई की आबोहवा में रमा उसका जीवन उसके अपनों से अलग थलग है, इसकी वजह से वह अधिक तरजीह हवेली के लोगों को नही देता। परन्तु जब वह इस दुःखद घड़ी में हवेली पहुँचता है, तब उसकी जेब से पिता के क्रियाकर्म तक के पैसे नही निकलते बल्कि उसका ध्यान उसके अपने हिस्से की संपत्ति पर अधिक होता है।
अंजली, सुधीर की पत्नी है जो उसके साथ बम्बई में रहती है। अंजली का क़िरदार पूजा मिश्रा ने निभाया है। पूजा मिश्रा मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित एवं वर्तमान हैदराबाद विश्वविद्यालय में अध्यनरत है। अंजली के किरदार को नाटक में संवाद अवश्य कम मिले हैं, परन्तु जिस जीवटता एवं ईमानदारी के साथ पूजा मिश्रा ने किरदार के साथ न्याय किया है वह अविस्मरणीय है। अंजली जो कि बम्बई जैसे महानगर में रहती है, उसके किरदार को उसके पति की तरह ही प्रगतिवादी दिखाया गया है। वह निष्पक्ष एवं खुले विचारों वाली महिला है। ससुराल पक्ष में उसकी जेठानी एवं ननद उसे बम्बई में रहने वाली और उसके कोंकणी होने पर उसे उलाहना देते दिखते हैं, पर अंजली उनकी बातों से बिफरती नही हैं बल्कि वह उन्हें महानगरों में रहने वालों के संघर्ष की बात बताती है। वह उन्हें समझाने का प्रयास करती है कि बम्बई जैसे शहर में रहना कितना मुश्किल है। यहाँ की बड़ी हवेली छोड़ कर वहाँ के 2 कमरे की खोली में ज़िन्दगी गुजारना कम चुनौतीपूर्ण नही है। साथ ही यह भी दिखाया गया कि अंजली को उसके पति की संपत्ति, जमीन जायदाद में ख़ास दिलचस्पी भी नही है।
प्रभा जो की स्वर्गीय तात्या की अविवाहित बेटी है। उसका किरदार शिल्पा द्विवेदी ने निभाया है। शिल्पा गम्भीर किस्म के किरदारों को पेशेवर ढंग से निभाती दिखीं हैं। वे नई अदाकारा हैं पर वे यथार्थवादी नाटको में कमाल का अभिनय करती दिखीं हैं। प्रभा एक ऐसी लड़की है, जिसे अपने स्वर्गवासी पिता के साथ कुछ खास हमदर्दी नही है, ना ही उसे अपने भाई और भाभी से विशेष लगाव है। किसी प्रतिभावान इंसान की प्रतिभा को निखरने से जब रोक दिया जाता है, तब उसे पारिवारिक तारतम्यता से नफ़रत होने लगती है। प्रभा जो की पढ़ाई लिखाई में अच्छी है, उसे देशपांडे परिवार की रूढ़िवादिता के आगे अपने सपनो की तिलांजली देने होती है। क्योंकि उस परिवार में लड़कियों को अधिक पढ़ाया लिखाया नही जाता है। इसी वजह से उसे अपने घर एवं घर के सदस्यों से नफरत है। जिसे वह समय समय पर ज़ाहिर करती है।
उसकी उम्र अब अधिक हो गई है, पर वह पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा लेकर पढ़ाई पूरा करना चाहती है।
प्रभा का किरदार एक सशक्त युवती का है, जो इस नाटक की नाटकीयता बरकरार रखने का कार्य करता है।
अम्मा जो की स्वर्गवासी तात्या की पत्नी है। उसका किरदार नई उभरती कलाकारा रूपाली ने खेला है।
रूपाली प्रतिभाशाली एवं अभिनय की अच्छी समझ रखने वाली रंगकर्मी है, जो अभी रंगकर्म के गुर सीख रही हैं।
किरदार बहुआयामी नही है परन्तु नाटक के प्रारम्भ में जिस तरह अम्मा आँगन में शोकाकुल बैठी हुई दिखाई देती हैं, वहीं से नाटक दर्शकों को अपने आगोश में लेना प्रारम्भ कर देता है। एक दुःखिया जिसका पति गुज़र गया है, जिसकी औलाद बाप के मृत्यु के बाद सम्पत्ति के बंटवारे के लिए जूतम पैजार करने पर आमादा है। जिस हवेली की मालकिन किसी ज़माने में पेशवा के दिए हीरे की अंगूठी पहना करती थीं, आज फटेहाली का यह दौर है कि पति की तेरहवीं के लिए अम्मा को हवेली का एझ हिस्सा गिरवी रखना पड़ता है, क्योंकि उसके दो बेटों ने हाथ खींच लिया है और तीसरा नादान है।
चंदू, तात्या का सबसे छोटा बेटा है, चंदू का किरदार अक्षय वालेजा ने निभाया है, अक्षय ने अपने किरदार को ठीक ढंग से समझा एवं उसे प्रभावपूर्ण रूप से खेला है। चंदू जो कि बेगारी करता है। घर वालों की हेकड़ी सहता है, घर एवं खेत के सारे काम बिना किसी मान मुरौवत के करता है। उसे पढ़ने नही दिया गया, ना ही उसके भविष्य की किसी को कुछ चिंता है। उसकी अम्मा और बहन प्रभा बस उसके बारे में चिंतित रहती है, परन्तु बड़ा भाई और भाभी उससे सारे काम करवाने के बावजूद भी उसे जली कटी सुनाते हैं। हालाँकि चंदू की इच्छा है कि उसकी अपनी एक दुकान हो, परन्तु इससे देशपांडे जैसे सभ्रांत परिवार की इज्जत पर आँच आ सकती है, इसलिए उसे डपट कर चुप करा दिया जाता था।
दादी जो स्वर्गवासी तात्या की माँ है वह अंधी और बहरी है। जिसे यह नही पता कि उसका बेटा तात्या अब नही रहा। नाटक की शुरुआत से लेकर अंत तक एक कोने में दुबकी, सर से पाँव तक कम्बल ओढ़े दादी अपने बेटे को पुकारती, खांसती , काँपती रहती है। दादी का किरदार अमर राज ने निभाया है। उनके किरदार के लिए संवाद नही है, परन्तु जिस तरह उन्होंने अंधी एवं बहरी वृद्धा का किरदार निभाया है, जो कि असहाय एवं लाचार हो चुकी है वह दर्शकों को उनके अंतर्मन में झाँकने के लिए मजबूर कर देता है।
मंच के विषय में जानकारी पूर्व में ही दी जा चुकी है।
परन्तु इस तरह के नाटक जिसमे 360 डिग्री परिप्रेक्ष्य से नाटक खेला जा रहा है, को समझना एवं नाटक का आनन्द ले पाना नये नाटक प्रेमियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। दर्शकों के पीछे से जो किरदार प्रवेश लेते हैं, और अभिनय करते हैं उनके हाव भाव को समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है परन्तु यह नाट्य परिकल्पना के नव प्रयोग का हिस्सा है। दर्शको को भी इस तरह की नाट्य प्रस्तुति के लिए अब तैयार होना होगा।
प्रॉपर्टीज के मामले में निर्देशक ने कोई कमी नही रखी है। इस बड़े नाटक के लिए हर उस वस्तु की व्यवस्था दर्शको को देखने के लिए मिलती है, जिससे वे नाटक से और अधिक आसानी के साथ जुड़ सकें। चारपाई, आँगन, ट्रेक्टर, लकड़ियां, उपले, नहाने की जगह आदि आदि प्रॉपर्टीज का प्रयोग नाटक के सफल मंचन के लिए किया गया है।
प्रकाश व्यवस्था की कमी इस नाटक में देखी जा सकती है। यदि नाटक में प्रकाश परिकल्पना एवं उचित व्यवस्था पर और कार्य किया जाता है, तो यह नाटक देखने वालों के लिए अधिक सुखद होता।
नाटक में बैकग्राउंड संगीत दिया गया है। जो कि काम चलाऊ है। परन्तु निर्देशक ने संगीत का प्रयोग किरदारों के हाव भाव, परिस्थितियों के अनुरूप रखा है जो कि नाटक से दर्शकों को बाँध कर रखने में सक्षम है।
शेक्सपियर के नाटक " हेमलेट " के तीसरे अंक में नायक हेमलेट अन्य अभिनेताओं जो कि बादशाह के दरबार में नाटक पेश करने वाले हैं उन्हें लम्बा चौड़ा भाषण देता है। उस भाषण के अंतिम शब्दों पर ध्यानाकृष्ट किया जाए - " याद रखो!! सैकड़ो वर्षों से नाटक का मनोरथ सिर्फ एक ही रहा है, और भविष्य में भी वही रहेगा - असलियत के सामने आईना रख देना, ताकि अच्छाई अपना रूप देख सके, बुराई अपना रूप। यही नहीं, समाज और जमाने के सारे उतार - चढ़ाव भी उस आईने में साफ़ दिखाई दें। "
नाटक " विरासत " असलियत के सामने आईना रख देने वाली प्रस्तुति है। बदलते परिवेश में जिस तरह पूँजीवाद का बोलबाला चहुँ ओर दिखाई दे रहा है, मनुष्य स्वार्थी बनता जा रहा है। उससे आम जन मानस एवं संयुक्त परिवार के जीवन में बुरा असर पड़ रहा है। परिवार के सदस्यों के मध्य प्रेम एवं अपनत्व खो सा जा रहा है। सुख और दुख, स्वार्थ, महत्वकांक्षा, वैचारिक वैमनस्यता, हर घर की राम कहानी है। सभी बेचैन है कोई सुखी नही है , ऐसे में सभी को प्रेम एवं अपनत्व ही इस बेचैनी के प्रकोप से बचा सकता है परन्तु लोग इन्ही से पीछे भागते है, भौतिकवादी युग के दुष्परिणामो ने पारिवारिक कलह को बढ़ावा दिया है।
इस नाटक को देखने वाले दर्शक, इसे अपने जीवन के साथ किसी ना किसी रूप में जुड़ा अवश्य पाएंगे। उन्हें बुढ़ापे के कष्ट को झेल रही दादी एवं मजबूरी की गुलामी की जंजीरों में जकड़ी अम्मा एवं प्रभा की वेदना एवं पीड़ा दिखाई देगी। साथ ही यह भी समझ आएगा कि इस बदलते परिवेश में सभी संघर्षशील हैं।
सतना शहर में " विरासत " जैसे नाटक में प्रयोग करना एवं उसका सफल मंचन करना भविष्यगामी सुखद संकेत हैं कि, शहर को इन कलाकारो के माध्यम से अनेक नई नाट्य सौगातें प्राप्त होने वाली हैं।



साधुवाद
ReplyDeleteधन्यवाद।
ReplyDelete