Wednesday, December 25, 2019

Story's by Mayank / " पहाड़ की चोटी "

" पहाड़ "



"पहाड़ की चोटी को भेद कर एक झरना बहा करता था।"
 पहाड़ के अन्तःस्थल से ना जाने कहाँ से इतना पानी निकलता है। कहते हैं कि कई साल पहले ऐसा नही था। पहाड़ की चोटी से कोई पानी नही निकलता था। एक लड़की को पहाड़ से बेइंतहा मोहब्बत थी। उसने पहाड़ से कहा -

 " मुझे तुम्हारे साथ अपनी सारी जिंदगी गुजारनी है, मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ"। 


परन्तु पहाड़ किसी से प्यार नही कर सकता था। वह अपना घर नही बसा सकता था। उस पर लगे जंगली वृक्ष और पौधे उसकी जिम्मेदारी थे। ऐसे में अपना घर बसा लेने का अर्थ था अपनी जिम्मेदारी से दूर हो जाना।


 वह अपने कर्तव्य से विमुख कैसे हो सकता था?

पहाड़ भीष्म था, जड़ था, ज़िम्मेदार पर भावुक था। दुःखी मन से उसने उस लड़की के प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। 

यह बात उस लड़की को नही समझ आई। वह खामोश थी। उसके हृदय में चुभन थी, जैसे कोई कीड़ा उसके दिल में घुस गया हो और वह उससे खून चूस रहा हो। 

लड़की की आँखों में दर्द और दुःख दोनों मौजूद था। 
वह पहाड़ की ओर देखना चाहती थी 
पर पहाड़ की आँखों में तो कर्तव्यपरायणता की पट्टी बंधी हुई थी। वह देख नही सकता था। अगर देख पाता तो भी वह अपना फैसला नही बदलता। 

लड़की ने पहाड़ की चोटी से छलांग लगा दी!



जमीन पाते ही उसका जिस्म शांत हो गया । दुःख और दर्द खत्म हो गए और वह कीड़ा दिल को चीर कर जुबान के रास्ते बाहर निकल आया। 


पर पहाड़ यह देख नही सकता था क्योंकि वह जड़ था। पर लड़की ने छलांग लगाते समय उसे जोर की आवाज लगाई थी।

पहाड़ ने वह सुन लिया था। उसे यह पता चल गया कि लड़की उसकी चोटी पर से छलांग लगा कर जान दे चुकी है।

पहाड़ की चोटी पर लड़की के पैर के निशान थे। जिस पत्थर पर खड़े होकर उसने छलांग लगाई थी उसमे उसके पंजे छप चुके थे।

पहाड़ अंदर से टूट चुका था। उसे अपने पहाड़ होने पर घृणा महसूस हो रही थी। ग्लानि उसे खाये जा रही थी।लड़की की चीखें वृक्षो से टकराकर वापस आ रही थी।

पहाड़ की आँखों से टपाटप आंसू निकलने लगे।
वह बिलखने लगा, दहाड़े मार कर रोने लगा।

जिस पत्थर पर लड़की के पैरों के निशान थे पहाड़ अपने आँसुओ से उन्हें भिगो कर अपने किये का पश्चाताप करने लगा। 
उसका यह दुःख कभी खत्म नही हुआ। वह अपने अन्तःस्थल को साफ़ कर देना चाहता था। वह अपने किये की सज़ा पाना चाहता था। वह लड़की के साथ घर बसाना चाहता था।

वह खूब , खूब ....खूब रोना चाहता था।

उन पंजो के निशान को अपने आँसुओ से भिगो कर वह प्रायश्चित करना चाहता था।

सारे बन्धनों और जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह प्यार करना चाहता था । 

अंतिम ख्वाहिश कभी पूरी नही हो सकती। अफ़सोस!!

लोग कहते हैं वह झरना आज उसी तरह बारहों महीने गिरता है। उसका पानी स्वाद में नमकीन रहता है पर यदि प्रेमी प्रेमिका उसके पानी को पी लेते है तो वे कभी अलग नही होते।


मयंक अग्निहोत्री✍️


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