Monday, July 20, 2020

तमन्नाओं के दर पर ( भाग - 2 )

गतांक से आगे ....

इस बार मैंने पूर्व की कहानी के पात्रों में कुछ तब्दीली की है। अब आप बंकू जी जो हमारी इस कहानी के नायक हैं, उन्हें केंद्र में रखते हुए इसका आनन्द उठाएं।

बंकू जी !!


कक्षा बारहवीं का एग्जाम हाल ही में देकर यहाँ आये हुए थे। लास्ट पेपर वाले दिन उन्होंने मैथ्स का पेपर फाड़कर उसे चिन्दी - चिन्दी कर डाला। और उन चिंदियो को आसमान की ओर फेंक कर अपने उत्साह का नमूना पेश करते हुए यह संदेश दिया - "  चलो, कम से कम उस स्कूल वाली जेल से छुट्टी मिली"

रिजल्ट जारी होने में कुछ ही दिन शेष थे। रिजल्ट की टेंशन भयानक थी। क्योंकि पेपर में क्या देकर वे आएं हैं, वह जानकारी सिर्फ बंकू जी और कॉपी चेक करने वाले को ही ज्ञात थी। बंकू जी को इस बात का इल्म बराबर था कि रिजल्ट बहुत खास नही रहने वाला। पिताजी के डर के मारे ग़ालिबन यह ख्याल जब भी मन में आता... जान हलक तक आ जाती। फिर उन्होंने सोचा की चलो गर्मी की छुट्टियाँ तो एन्जॉय ही करते हैं। टेंशन लेकर भला लड़का कब तलक जिए। हालाँकि लड़के ने सपने बहुत बड़े - बड़े देख रखे थे, इसीलिये पिताजी ने नालायक एवं बुद्धिहीन जैसी उपाधियों से सम्मानित किया था। जब भी नालायक बोलते तो साथ में दो झापड़ तो कभी ज्यादा मन किया तो जूता , चप्पल रसीद देते। 

उस वक़्त बंकू जी की जो उम्र थी। उस उम्र में लड़कों के सपने समूचे ब्रम्हाण्ड को हिला देने वाले होते हैं। जो लड़के पढ़ाई में तेज होते हैं वे इंजीनियर, डॉक्टर, कलेक्टर, साइंटिस्ट आदि बनने एवं महीने में मिलने वाली एकमुश्त सैलरी या पैकेज से खुश रहने के सपनों को सँजोये पढ़ाई कर रहे होते हैं। तो पढ़ाई में औसत दर्जे के गुड़गोबर लड़के क्रिकेटर, एक्टर, डायरेक्टर , मॉडल,पॉलिटिशियन बनने के ख्वाब देखते हैं। उनके सपने दुनिया जीतने के होते हैं। उनके सपनों के हाथ, पैर, नाक, कान नही होते, होती है तो सिर्फ  "खुरखुंदी", जिसे कुछ लम्पटों ने "जूनून" का नाम दिया है।पर यहां पर हमें बंकू जी की सफलता, असफलता समय के लिए निर्धारित करने के लिए छोड़ देना चाहिए तो बेहतर।

एक बार स्कूल की तरफ से बाल फिल्म महोत्सव में "आमिर खान" की "तारे जमीं पर" फिल्म दिखाई गई। उसमें बड़ा जोर देकर बताया गया कि हर बच्चा स्पेशल होता है। जरूरी नही कि सारे बच्चे पढ़ाई में अव्वल ही हों। कुछ तारे.. जमीन पर पढ़ाई में अव्वल होते हैं, तो कुछ लड़ाई, आर्ट एंड क्राफ्ट या स्पोर्ट्स आदि में चमक जाते हैं। जरूरत है माँ बाप एवं टीचरों को बच्चे की वास्तविक प्रतिभा पहचानने की। 

बस यही बात बंकू जी के दिल को छू गई। उनको यह भली भांति मालूम था। कि पढ़ाई में हमारा कोई खास इंटरेस्ट नही है। पिताजी लोग अगर किसी दिन बोल दे कि " आज से पढ़ाई लिखाई बन्द " तो हमारे लिए यह किसी कैद से रिहाई वाली बात होती। उन्होंने तत्त्काल प्रभाव से यह डिसाइड किया कि हम भी स्पेशल बच्चो में से ही एक है। हमारे अंदर भी एक विशेष प्रतिभा है। बस उसकी पहचान करने की आवश्यक्ता है। 



घर लौटते वक्त रास्ते भर दिमाग के घोड़े दौड़ाते रहे, कि कौन हमारी प्रतिभा की पहचान कराने में हमारी मदद कर सकता है। पिताजी से बात करने में हमारी घनघोरतम रूप से फटती है। उनसे ऐसी बात कर पाना हमारे जैसे लड़के के लिए बिल्ली के गले में घण्टी बांधने के समान था। और कहीं उनको ये पता चल गया कि पढ़ाई में हमारा इंटरेस्ट नही है । तो मार - मार कर भरता ही बना देंगें। टीचरों पर तो एक रत्ती भरोसा नही था। बल्कि अगर उनसे ऐसा कहे, तो वो हमारी प्रगति पुस्तिका में Undisciplined की नोट टीप देंगे। 

" मे आई हैव योर अटेंशन प्लीज़। ट्रेन नम्बर 12448 रीवा टू न्यू डेल्ही "आनन्द विहार टर्मिनस रीवा एक्सप्रेस" स्टैंडिंग ऑन प्लेटफॉर्म नम्बर फोर ।"

....और लगभग साढ़े तीन घण्टे के सफर के बाद बंकू जी की गाड़ी इलाहाबाद जंक्शन पर जा पहुँची।
बंकू जी के मन ही मन फूले नही समा रहे थे। अपने छोटे भाई का हाथ एक हाथ से थामे और दूसरे हाथ से बैग को पकड़े हुए बंकू जी प्लेटफॉर्म पर उतरे। अब उनकी नज़रें अंकल जी को तलाश रही थीं। 

तभी अचानक छोटे भाई की नज़र बुक स्टॉल पर चली गई, और आदतन वो अपना हाथ छुड़ाकर बुक स्टॉल की भीड़ में कॉमिक्स ढूंढने लगा। बंकू जी, अंकल जी को खोजते इतने मशगूल हो गए कि उन्हें यह एहसास तक ना हुआ कि उनका छोटा भाई उर्फ़ कॉमिक्स प्रेमी अब उनसे हाथ छुड़ा कर गायब हो चुका है। इलाहबाद स्टेशन की भीड़ से अचानक ही किसी ने बंकू जी के पैर  पर पैर रख कर चढ़ता निकल गया। उस भलेमानुस की इस क्रिया ने बंकू जी की आह निकाल दी। अचानक उनकी तन्द्रा टूटी और जब उन्होंने गौर किया तो देखा " अरे यह क्या?" सनी बाबू यहीं पर तो थे.. कहाँ चला गया। इधर - उधर खूब नज़रें दौड़ाई पर सनी बाबू का नामो निशान नहीं। किसी अनिष्ट की आशंका की घबराहट के मारे उनकी साँसे तेज़ हो गई और चेहरा सूखने लगा। बंकू जी अब अंकल जी की तलाश छोड़ कर सनी बाबू की खोज में  लग गए। 

उधर अंकल जी की मनोस्थिति भी कुछ - कुछ ऐसी ही हो चली थी। गाड़ी इलाहाबाद स्टेशन पहुँचे पंद्रह मिनट हो चुके थे। परन्तु अब तलक दोनों बच्चों का कहीं कुछ पता नहीं। 

तभी अंकल जी की नज़रें बदहवास हालात में यहाँ वहाँ ताकते बंकू जी पर पड़ी। और वे चेहरे पर स्माइल चिपकाए हुए बंकू जी के पास जा पहुँचे। 

" कैसा रहा ट्रेन का सफ़र बंकू उस्ताद ?" 

अंकल जी ने बैग को अपने काँधे पर टांगते हुए सवाल किया। तभी सहसा उन्हें कुछ याद आया । हड़बड़ा कर दूसरा सवाल दागा -

"सनी कहाँ हैं बंकू ?"

सारा माज़रा तत्काल प्रभाव से समझ कर।
 बिना किसी देरी के अंकल जी बंकू जी के साथ सनी बाबू की तलाश करने लगे। बंकू जी के मन में अब भय रस ने जगह लेनी प्रारम्भ कर दी थी। बंकू जी के साथ अंकल जी की भी जान सूखी जा रही थी। सनी बाबू छोटे से हैं अभी, उनको तो कुछ पता भी तो नही। ना मिले तो क्या होगा ???

इस तरह के कई सवालों से जूझते हुए अंकल जी की नज़र सर्वोदय साहित्य भंडार की दुकान पर जा टिकी। जहाँ सनी बाबू मगन होकर चम्पक हाथों में लिए पढ़ रहे थे। उन्हें इससे रत्ती भर भी फर्क नही पड़ता था कि उनके बड़े भाई बंकू जी भी साथ आये हुए हैं । अंकल जी ने बंकू जी को इशारा किया। वे सनी बाबू के पास पहुँचने ही वाले थे कि स्टॉल के मालिक ने चम्पक सनी बाबू के हाथ से छीनते हुए डपटकर कहा - 

" ऐ छोकरे !!

 पूरी किताब पढ़े जा रहा है मुफ्त में। चालाकी दिखाता है, हमको गधा समझे हो का। पैसे हो तो बात करो, नही तो जाओ अपनी मम्मी के पास ।"

गज़ब बेइज्जती छोटे से सनी बाबू की। खुद्दारी उनके रग - रग में बहा करती थी। तत्काल प्रभाव से उन्होंने कार्यवाही करते हुए अपनी जेब से 20 का नोट जो उन्हें स्टेशन में पापा ने दिया था. 
... दुकानदार के पास फेंकते हुए कहा -
" चम्पक हमको वापस करो ।"

दूकान वाले ने उन्हें पुचकारते हुए कहा -

"किताब पच्चीस की है "

सनी बाबू का माथा ठनका। अब पाँच रूपये कहाँ से लाये जाएं। तभी उन्हें अपनी रिस्ट वॉच दिखाई दी। उन्होंने तुरंत उसे उतारकर दुकानदार को देते हुए कहा -

"घर आकर देखना कभी मेरा कलेक्शन, हर महीने मेरे घर आती है चम्पक। हमारे हाथ से चम्पक छीन लिए हैं ??,
रखो ये घड़ी। दो सौ की है, और चम्पक के साथ नागराज की ये दो कॉमिक्स और चाचा चौधरी की ये 2 कॉमिक्स दे दो।"

छोटे से बच्चे का पक्का हिसाब किताब देख कर दुकानदार के साथ - साथ बंकू जी और अंकल जी जो छिपकर सनी बाबू के swag का जलवा देख रहे थे.. मुस्कुराने लगे।

अंकल जी ने अब मोर्चा संभाला। सनी बाबू को अब चम्पक के साथ दो नागराज और दो चाचा चौधरी कॉमिक्स तो मिल चुकी थी। पर सबसे अच्छी बात यह रही कि, सनी बाबू की रिस्ट वॉच अभी भी उनकी कलाई पर ही बंधी हुई थी और बीस रूपये का नोट अब भी उनकी शर्ट की जेब में सुरक्षित था। 

अंकल जी के घर पहुंच कर दोनों ने डिनर किया, और सो गए। अगले दिन गृह प्रवेश कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। बंकू जी और सनी बाबू  दोनों भाइयों को खूब पैसे भी मिले। बंकू जी और सनी बाबू ने आपसी सामंजस्य बिठाते हुए यह तय किया, कि हर बार की तरह हम सारे पैसे घर पहुँचकर माताजी के हाथ में सौंप देंगे। 

छुटपन में ना ज्यादा शौक होते थे, ना ज्यादा दिमाग काम करता है।  परन्तु गर्मी की छुट्टियों में गेम पार्लर जाकर यदि गेम नही खेले, जी भरकर सकौड़ा, चाट,फ़ुल्की, मोमोज नही दबाए... और सबसे जरूरी चीज कॉमिक्स नही खरीदी तो गर्मी की छुट्टी का क्या ख़ाक एन्जॉय करी। इसीलिये दोनों ने उन सारे पैसो में से सौ का नोट अपने जेब में टेकेन 3 खेलने के लिए रख लिया, बाकी के पैसे अपने बैग में रख दिए। 


क्रमशः



©मयंक अग्निहोत्री ✍️


4 comments:

  1. 👌👌❣️

    मैंने दोबारा से प्रथम भाग पढ़कर द्वितीय भाग को पढ़ा है
    इसमें कोई शक नहीं कि कहानी ने मुझे अपने साथ बांधे रखा,
    #शानदार लगी ।
    अगले भाग का इन्तजार रहेगा...

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  2. आपकी हर रचना सर्वोत्तम ही रहती है ,अगले भाग का ििइंतज़ार है।

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  3. Pranam sir , pahle baad ko padhne ke baad dusare bhaag ke liye dugni rochakta thi.

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  4. बहुत बढ़िया वाह अगले का इंतजार है!

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