Wednesday, December 25, 2019

Story's by Mayank/ मुंबई हमले का गुमनाम हीरो।

26 नवम्बर 2008 मुंबई..


एक ऐसी तारीख जो हर भारतीय की आँखे नम कर जाती है। यह भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शहर मुंबई में सिलसिलेवार तरीके से हुए आतंकी हमले की याद दिलाती है।


मुंबई एक ऐसा शहर जहाँ विश्व के कई देशों के लोग रहते हैं। एक ऐसा शहर जहाँ हर रोज लाखों सपने जन्म लेते और दम तोड़ते है। समंदर के किनारे बसा यह खूबसूरत शहर वास्तव में समंदर के नक़्शे कदम पर चलने वाला है। निष्ठा, जिम्मेदारी एवं ईमानदारी से काम करने वाले जितना चाहे अपने काबिलियत के दम पर इस समंदर से सफलता के पानी को भर सकते हैं। यह  शहर सबका स्वागत बाहें फैलाकर करता है।
इसी खूबसूरत शहर ने कई बार आतंकी हमलों का दंश झेला है। इन्ही में से एक है 26/11 , 2008 को मुंबई के होटल ताज में हुआ हमला। जो इस शहर के काले अध्याय के रूप में जुड़ा हुआ है। एक के बाद एक 12 लगातार हमले हुए और मुंबई शहर के निवासी 3 दिनों तक खौफ के साए में घिरे रहे।


इन हमलों के दौरान जहाँ कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए हर सम्भव प्रयास कर रहे थे तो उन्ही में से कुछ ऐसे विरले भी थे जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर कई लोगों को मौत के मुँह से बाहर निकाला और उनकी जान की सलामती की। ऐसे बहादुर जाबांजो पर देश को गर्व है और इन्ही में से एक नाम है।
तत्कालीन अमेरिकी मरीन कैप्टन रवि धर्निधिरका का। जिन्होंने अपनी जान की तनिक भी परवाह ना करते हुए ताज होटल में हुए हमलों में आतंकियों की घेरा बंदी को धता बता कर 157 लोगों की जान बचाई।

कैप्टन रवि धर्निधिरका अमेरिकी मरीन कॉर्प्स में कैप्टन के पद पर कार्यरत थे उन्होंने इराक में लगभग 200 से अधिक युद्धक अभियानों में उड़ान भरते हुए तकरीबन चार वर्ष व्यतीत किये हुए थे। इन चार वर्षों के दौरान 2004 में फालुजा का रक्तरंजित युद्ध भी शामिल था।
वे लगभग 10 वर्ष बाद अपने परिवार के संग छुट्टी बिताने हेतु मुंबई आये थे। उनका परिवार मुंबई में ही रहता था।

वे 26 नवम्बर 2008 के दिन होटल ताज़ अपने अंकल और कजिन से व्यवसायिक मीटिंग के सिलसिले में पहुँचे थे। जैसे ही उन्होंने होटल में प्रवेश किया उन्हें मेटल डिटेक्टर के बीप की आवाज सुनाई नही दी। उन्हें होटल के सुरक्षाकर्मियों एवं कर्मचारियों  का रवैया ढुलमुल लगा क्योंकि उन्हें इस बात से कोई ख़ास मतलब नही था कि डिटेक्टर सही ढंग से काम नही कर रहा। उन्हें लगा की शायद वह ख़राब हो गया है। 

चूंकि उनकी मीटिंग 20 वीं मंजिल पर थी तो अधिक समय जाया ना करते हुए वे अपने अंकल के पास जा पहुंचे।

मीटिंग प्रारम्भ ही हुई थी कि तभी अचानक उन्हें होटल में काफी शोरगुल सुनाई देने लगा। पूरे होटल में अफ़रातफ़री मची हुई थी। लोग यहाँ वहाँ भाग रहे थे। सभी के मोबाइल फोन भी अचानक से साथ बज उठे। तब तक रवि धर्निधिरका को समझ आ चुका था कि होटल में आतंकी हमला हुआ है और आतंकी होटल के अंदर प्रवेश कर चुके हैं।

लोगों के शोरगुल के बीच रवि धर्निधिरका एवं उनके कुछ साथियों ने इस स्थिति से निपटने की योजना पर काम शुरू कर दिया। चूंकि वे ऐसी परिस्थितयो का सामना पूर्व में भी कर चुके थे इसलिए वे गम्भीरता पूर्वक वस्तु स्थिति को समझने के प्रयास में संलिप्त थे कि किस तरह से लोगों की जानें बचाई जा सकती है।
चूंकि अन्य सैन्य ऑपरेशन के दौरान वे अस्त्र शस्त्र एवं योजनाबद्ध तरीके से कार्य करते थे ।

पर यहाँ पर माहौल अलग था। तब उनके पास ना हथियार थे ना ही बॉडी आर्मर। फिर भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को समझा और सुरक्षात्मक कार्य करना शुरू कर दिया।

कुछ वक़्त बीत जाने के बाद अचानक छठी मंजिल पर दो आरडीएक्स ब्लास्ट हुए। जिससे वह आग की गिरफ्त में आ चुकी थी। और धीरे धीरे आग ऊपर की मंजिल को अपनी गिरफ्त में ले रही थी। 

रवि धर्निधिरका ने सबसे पहले घबराए हुए लोगों को शांत कराया और कहा कि हमे सुरक्षाबलों पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं की सुरक्षा करनी होगी।
सभी 157 लोग एक हॉल में इकट्ठे हो चुके थे। उन्होंने आने जाने के दरवाजों को बंद कर उनसे सटाकर सोफे रख दिए जिससे कोई भी बाहरी व्यक्ति उस हॉल में आसानी से प्रवेश ना कर सके।

परन्तु यहाँ अभी समस्या समाप्त नही हुई थी आग तेजी से ऊपर की ओर बढ़ रही थी और 20 वीं मंजिल पर शार्ट सर्किट का भी खतरा मौजूद था। रवि बराबर खिड़की से बाहर देख कर अन्य गतिविधियों पर भी नजर रखे हुए थे। सभी लोग डरे सहमे हुए ईश्वर से अपनी जान की सलामती की दुआ कर रहे थे।
तभी रवि की प्रतिउत्तपन्न मति ने एक योजना बनाई। उन्होंने सभी लोगो से उनके मोबाइल फोन को स्विच ऑफ करने के लिए कहा और जूते उतारने का निर्देश दिया। 

उनके साथ के अन्य पूर्व सैन्य अधिकारी भी मौजूद थे। जो रवि को सुरक्षात्मक कार्यवाही में सहायता कर रहे थे। रवि ने हॉल में उपस्थित सभी लोगों को निर्देश देते हुए पीछे की सीढ़ियों से बाहर निकलने को कहा। सबसे पहले पूर्व सैन्य अधिकारीगण उसके बाद पुरुष और खतरों से बचाव के लिए उन सबके पीछे महिलाएँ एवं बच्चे धीरे धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। 

कुछ ही समय उपरांत सभी लोग आसानी से होटल के बाहर सुरक्षित पहुँच चुके थे पर अब भी हॉल में रवि के साथ कुछ होटल कर्मचारी मौजूद थे।
तभी रवि के नजर हॉल में एक कुर्सी पर बैठी हुई वृद्ध महिला पर गई। वे 20 मंज़िल की सीढ़ियों से नीचे उतरने में असमर्थ थी। रवि ने उनसे नीचे उतरने के लिए कहा तो उन्होंने रवि से कहा कि वे उसकी फ़िक्र मत करें। वे अपनी जान बचाकर निकल जाए मैं इतनी सीढ़ियां नही उतर सकती। अब जो भगवान चाहेंगे वही होगा।
रवि उस महिला को अकेला छोड़कर नही जाना चाहते थे। उन्होंने एक होटल कर्मचारी की मदद से उन वृद्ध महिला को गोद में उठाया और सावधानी पूर्वक पीछे की सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। 

चूंकि 20 मंजिल की सीढ़ियों से उन वृद्ध महिला को लेकर उतर पाना बहुत ही मुश्किल कार्य था।
पर रवि ने हिम्मत नही हारी।
सभी लोगों की उम्मीदें रवि पर टिकी हुई थी। रवि उस वक़्त उन सभी की अंतिम उम्मीद के रूप में मौजूद थे।
और तमाम मुश्किलों का बाद रवि ने उन वृद्ध महिला को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
इस तरह रवि धर्निधिरका की सूझ - बूझ, अदम्य साहस एवं वीरता की वजह से 157 लोग मुंबई हमले में सुरक्षित बच सके।
रवि की तरह कई लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कई मासूमों की जान बचाई थी।
उन सभी वीर सपूतों का देश सदा ऋणी रहेगा।
उन सभी की वीरता को नमन ।
  


कैप्टन रवि धर्निधिरका की तस्वीर : साभार गूगल

मयंक अग्निहोत्री

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