" साहित्य के झींगुर "

साहित्य के झींगुर
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हम सभी ने मिलकर कुछ चमन चूतियों को साहित्य का रहनुमा बना रखा है। 
फ़लाने को पढ़ो..!!
बहुत अच्छा लिखते हैं,
ढिकाने बड़ा गम्भीर लिखते हैं.. उनको नही जानते क्या..?

अबे तुम्हारी... 
तुम साले खुद को जानते हो की तुम क्या लिखते - पढ़ते हो। कितनी दुनियादारी समझते हो।
बचकाने लेखकों के भूतिया पिरामिड में कैद तुम्हारे वैचारिकी एवं सृजन की ममी आख़िर कब तक दफ़्न रहेगी ..? 
जरा सोचो...।

ज़नाब हो सकता है मेरे विचार आपको रूड लगें, पर जिन्हें आप बड़का विद्वान् मानते हैं, उनका तो पूरा कंटेंट ही न्यूड है। साहित्य को पॉर्नहब बनाने में उनका लेखन और आपका प्रोत्साहन यही दो बातें भरपूर मैटर करती हैं। जो तालियां आप उनकी तशरीफों पर देते आये हो, वही तालियां उनके गालों पर देनी चाहिए... वो भी जमकर....!

तुम सबको उनका फक्कड़पन, बोल्डनेस, असंतुलित जीवन एवं चूतियाप लेखन बड़ा कूल लगता है !
 तुम्हे लगता है कि काश तुम भी ऐसा कर सकते... पर तुम तो साले 9 से 5 की जॉब में ही अपना पूरा तेल निकलवाये पड़े हो।  इस जन्म में तुम्हारा उनके जैसे होना तुम्हे भूल जाना चाहिए। पर यह क्यों नही समझते की उनके टट्टी जैसे जीवन पर तुमको नाक ढक कर आगे की राह पर बढ़ जाना चाहिए। तुमको जो कूल लगता है वो उन कमीनों की कमजोरियां हैं। वो ना तो जिम्मेदारियां उठा सकते.. ना ही उनके अंदर इच्छाशक्ति की जगह बची है। बस... ज्ञान खोदवा लो उनसे.. बातें बनवा लो, गप्प मरवा लो, गाली दिलवा लो, अकड़ दिखवालो, चूतिया बनवालो और अपना कटवा लो।

तुम्हारा जीवन उन महाबेगैरतों के जीवन से कहीं गुना ज्यादा अच्छा है। यह बात समझने की कोशिश करो।




और सुनो बे... तुम सब बचकाने लेखक...

तुम सालों को ये लगता है कि तुमने दादा - परदाओं या भौंडेपन की भाषा में लिखकर आज के साहित्य में बड़ी प्राण वायु की ऑक्सीजन फूँक दी है... 
तो सुनो स्वघोषित कालिदास के नातीगण... 
 तुम जो सा - हत्यिक अहलेखाना बनने की जुगत में हो... ख़ारिज करना , मजाक बनाना और आलोचना करना अपने बाप की बपौती समझते हो। भले ही इस बेगारी के अच्छे पैसे भी कमा लो। अपने लेखन के सपोर्ट में तालियाँ पिटवा लो, छाती कुटवा लो...

 पर तुम्हारी क़ब्रो पर तुम्हारा खुद का कुत्ता कब मूत कर चला जायेगा... तुम खुद नही समझ सकोगे। तब ना तुम रहोगे.. न किसी को ख़ारिज कर सकोगे.. ना अपना ज्ञान भोंक सकोगे। जो बोओगे वही खाओ और खिलाओगे...

तुममे से कोई रशियन साहित्य से चेंपता है, तो कोई जर्मन... कोई कल्ट की गर्त में झांकता है तो कोई सीधा चोरी ही कर लेता है। कोई वास्तविक नही है और इस तरह से कुछ वास्तविक हो भी नही सकेगा कभी। साहित्य में वास्तविक जैसा कुछ नही था ना कभी हो सकेगा। जो है प्रत्यक्ष है.. कोई नग्न आँखों से देख पाता है तो कोई इग्नोर कर देता है। पढ़ने से कहीं अधिक आम जन जीवन की समझ तथा अनुभवों का ज्ञान ही असल साहित्य कहलाया जा सकता है। बाकी सब फेकोलॉजी है...

और तुम सब fandom लैंड के फैनवासियों... 

"घण्टा" तुम्हारे आका अच्छा लिखते हैं और "घण्टा" तुम सब अच्छा पढ़ते हो। कुछ दारू लिखते है तो कुछ
 बिना कपड़ों की लड़की की पीठ का साहित्य लिखते हैं। कोई सहवास करना चाहता है, और कोई लिखकर अपनी काम इच्छाओं को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर उसे साहित्य का टोपा पहना देता है। पर उन चूतियों का टोपा हमेशा और हमेशा लूज़ ही रहेगा... और समय रहते यदि बराबर क्लैम्प ना किया गया तो उनके जैसे चूतियों का जन्म बराबर होता रहेगा। 

लिखना तो और ब्रूटली था। पर उन मानसिक अस्थिरता और मुँह मियां मिट्ठू वाले लोगों पर कलम ज्यादा घिसना मैं मुनासिब नही समझता। पहले कभी वो बड़े इम्पोर्टेन्ट लगते थे। पर अब महा चूतिये लगते हैं ।

वही...जिनके पिछवाड़े में मची चुल्ल को नौसिखिये लोग... खुजलाते और मलहम लगाते रहते हैं....

हां जी हां सब आपके लिए ही है....
#चूतिये

#साहित्यिकठेकेदार
#पापड़पोलकीखोपड़ीखोल
#जागोमोहनप्यारे

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